Sunday, 17 May 2015

भगतसिंह पूरा नाम शहीद-ए-आज़म अमर शहीद सरदार

भगतसिंह

पूरा नाम शहीद-ए-आज़म अमर शहीद सरदार भगतसिंह
अन्य नाम भागां वाला
जन्म27 सितंबर, 1907
जन्म भूमिलायलपुर, पंजाब
मृत्यु23 मार्च, 1931 ई.
मृत्यु स्थानलाहौर, पंजाब
मृत्यु कारण शहीद
अविभावक सरदार किशन सिंह
धर्मसिख
आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम
जेल यात्रा असेम्बली बमकाण्ड (8 अप्रैल, 1929)
विद्यालय डी.ए.वी. स्कूल
शिक्षा बारहवीं
संबंधित लेखसुखदेव, राजगुरु
प्रमुख संगठन नौज़वान भारत सभा, कीर्ति किसान पार्टी एवं हिन्दुस्तान समाजवादी गणतंत्र संघ
रचनाएँ आत्मकथा दि डोर टू डेथ (मौत के दरवाज़े पर), आइडियल ऑफ़ सोशलिज्म (समाजवाद का आदर्श), स्वाधीनता की लड़ाई में पंजाब का पहला उभार।
अमर शहीद सरदार भगतसिंह (जन्म- 27 सितंबर, 1907 ई., लायलपुर, पंजाब, मृत्यु- 23 मार्च, 1931 ई., लाहौर, पंजाब) का नाम विश्व में 20वीं शताब्दी के अमर शहीदों में बहुत ऊँचा है। भगतसिंह ने देश की आज़ादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया, वह आज के युवकों के लिए एक बहुत बड़ा आदर्श है। भगतसिंह अपने देश के लिये ही जीये और उसी के लिए शहीद भी हो गये।
जीवन परिचय

भगतसिंह का जन्म 27 सितंबर, 1907 को पंजाब के ज़िला लायलपुर में बंगा गाँव (पाकिस्तान) में हुआ था, एक देशभक्त सिख परिवार में हुआ था, जिसका अनुकूल प्रभाव उन पर पड़ा था। भगतसिंह के पिता 'सरदार किशन सिंह' एवं उनके दो चाचा 'अजीतसिंह' तथा 'स्वर्णसिंह' अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ होने के कारण जेल में बन्द थे । जिस दिन भगतसिंह पैदा हुए उनके पिता एवं चाचा को जेल से रिहा किया गया । इस शुभ घड़ी के अवसर पर भगतसिंह के घर में खुशी और भी बढ़ गयी थी । भगतसिंह की दादी ने बच्चे का नाम 'भागां वाला' (अच्छे भाग्य वाला) रखा । बाद में उन्हें 'भगतसिंह' कहा जाने लगा । वे 14 वर्ष की आयु से ही पंजाब की क्रान्तिकारी संस्थाओं में कार्य करने लगे थे। डी.ए.वी. स्कूल से उन्होंने नवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की। 1923 में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद उन्हें विवाह बन्धन में बाँधने की तैयारियाँ होने लगी तो वे लाहौर से भागकर कानपुर आ गये।
सम्पादकीय लेख

कानपुर में उन्हें श्री गणेश शंकर विद्यार्थी का हार्दिक सहयोग भी प्राप्त हुआ। देश की स्वतंत्रता के लिए अखिल भारतीय स्तर पर क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन करने का श्रेय सरदार भगतसिंह को ही जाता है। उन्होंने कानपुर के 'प्रताप' में 'बलवंत सिंह' के नाम से तथा दिल्ली में 'अर्जुन' के सम्पादकीय विभाग में 'अर्जुन सिंह' के नाम से कुछ समय काम किया और अपने को 'नौजवान भारत सभा' से भी सम्बद्ध रखा।
क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में

1919 में रॉलेक्ट एक्ट के विरोध में संपूर्ण भारत में प्रदर्शन हो रहे थे और इसी वर्ष 13 अप्रैल को जलियांवाला बाग़ काण्ड हुआ । इस काण्ड का समाचार सुनकर भगतसिंह लाहौर से अमृतसर पहुंचे। देश पर मर-मिटने वाले शहीदों के प्रति श्रध्दांजलि दी तथा रक्त से भीगी मिट्टी को उन्होंने एक बोतल में रख लिया, जिससे सदैव यह याद रहे कि उन्हें अपने देश और देशवासियों के अपमान का बदला लेना है ।
असहयोग आंदोलन का प्रभाव

विषय सूची
1 जीवन परिचय
2 सम्पादकीय लेख
3 क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में
4 असहयोग आंदोलन का प्रभाव
5 सेफ्टी बिल तथा ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल का विरोध
6 असेम्बली बमकाण्ड
7 फाँसी की सज़ा
8 अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य
9 टीका टिप्पणी और संदर्भ
10 बाहरी कड़ियाँ
11 संबंधित लेख
1920 के महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर 1921 में भगतसिंह ने स्कूल छोड़ दिया। असहयोग आंदोलन से प्रभावित छात्रों के लिए लाला लाजपत राय ने लाहौर में 'नेशनल कॉलेज' की स्थापना की थी। इसी कॉलेज में भगतसिंह ने भी प्रवेश लिया। 'पंजाब नेशनल कॉलेज' में उनकी देशभक्ति की भावना फलने-फूलने लगी। इसी कॉलेज में ही यशपाल, भगवतीचरण, सुखदेव, तीर्थराम, झण्डासिंह आदि क्रांतिकारियों से संपर्क हुआ। कॉलेज में एक नेशनल नाटक क्लब भी था। इसी क्लब के माध्यम से भगतसिंह ने देशभक्तिपूर्ण नाटकों में अभिनय भी किया। ये नाटक थे -
राणा प्रताप
भारत-दुर्दशा
सम्राट चन्द्रगुप्त[1]।
वे 'चन्द्रशेखर आज़ाद' जैस महान क्रान्तिकारी के सम्पर्क में आये और बाद में उनके प्रगाढ़ मित्र बन गये। 1928 में 'सांडर्स हत्याकाण्ड' के वे प्रमुख नायक थे। 8 अप्रैल, 1929 को ऐतिहासिक 'असेम्बली बमकाण्ड' के भी वे प्रमुख अभियुक्त माने गये थे। जेल में उन्होंने भूख हड़ताल भी की थी। वास्तव में इतिहास का एक अध्याय ही भगतसिंह के साहस, शौर्य, दृढ़ सकंल्प और बलिदान की कहानियों से भरा पड़ा है।
सेफ्टी बिल तथा ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल का विरोध

विचार-विमर्श के पश्चात यह निर्णय हुआ कि इस सारे कार्य को भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु अंजाम देंगे।

पंजाब के बेटों ने लाजपत राय के ख़ून का बदला ख़ून से ले लिया। सांडर्स और उसके कुछ साथी गोलियों से भून दिए गए। उन्हीं दिनों अंग्रेज़ सरकार दिल्ली की असेंबली में पब्लिक 'सेफ्टी बिल' और 'ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल' लाने की तैयारी में थी। ये बहुत ही दमनकारी क़ानून थे और सरकार इन्हें पास करने का फैसला कर चुकी थी। शासकों का इस बिल को क़ानून बनाने के पीछे उद्देश्य था कि जनता में क्रांति का जो बीज पनप रहा है उसे अंकुरित होने से पहले ही समाप्त कर दिया जाए।
असेम्बली बमकाण्ड

सुखदेव, भगतसिंह, राजगुरु
Sukhdev, Bhagat Singh and Rajguru
गंभीर विचार-विमर्श के पश्चात 8 अप्रैल 1929 का दिन असेंबली में बम फेंकने के लिए तय हुआ और इस कार्य के लिए भगत सिंह एवं बटुकेश्र्वर दत्त निश्चित हुए। यद्यपि असेंबली के बहुत से सदस्य इस दमनकारी क़ानून के विरुद्ध थे तथापि वायसराय इसे अपने विशेषाधिकार से पास करना चाहता था। इसलिए यही तय हुआ कि जब वायसराय पब्लिक सेफ्टी बिल को क़ानून बनाने के लिए प्रस्तुत करे, ठीक उसी समय धमाका किया जाए और ऐसा ही किया भी गया। जैसे ही बिल संबंधी घोषणा की गई तभी भगत सिंह ने बम फेंका। इसके पश्चात क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करने का दौर चला। भगत सिंह और बटुकेश्र्वर दत्त को आजीवन कारावास मिला।
भगत सिंह और उनके साथियों पर 'लाहौर षडयंत्र' का मुक़दमा भी जेल में रहते ही चला। भागे हुए क्रांतिकारियों में प्रमुख राजगुरु पूना से गिरफ़्तार करके लाए गए। अंत में अदालत ने वही फैसला दिया, जिसकी पहले से ही उम्मीद थी। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु को मृत्युदंड की सज़ा मिली।
फाँसी की सज़ा

23 मार्च 1931 की रात भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु देशभक्ति को अपराध कहकर फांसी पर लटका दिए गए। यह भी माना जाता है कि मृत्युदंड के लिए 24 मार्च की सुबह ही तय थी, लेकिन जन रोष से डरी सरकार ने 23-24 मार्च की मध्यरात्रि ही इन वीरों की जीवनलीला समाप्त कर दी और रात के अंधेरे में ही सतलुज के किनारे उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया। 'लाहौर षड़यंत्र' के मुक़दमें में भगतसिंह को फ़ाँसी की सज़ा मिली तथा 23 वर्ष 5 माह और 23 दिन की आयु में ही, 23 मार्च 1931 की रात में उन्होंने हँसते-हँसते संसार से विदा ले ली। भगतसिंह के उदय से न केवल अपने देश के स्वतंत्रता संघर्ष को गति मिली वरन् नवयुवकों के लिए भी प्रेरणा स्रोत सिद्ध हुआ। वे देश के समस्त शहीदों के सिरमौर थे। 24 मार्च को यह समाचार जब देशवासियों को मिला तो लोग वहां पहुंचे, जहां इन शहीदों की पवित्र राख और कुछ अस्थियां पड़ी थीं। देश के दीवाने उस राख को ही सिर पर लगाए उन अस्थियों को संभाले अंग्रेज़ी साम्राज्य को उखाड़ फेंकने का संकल्प लेने लगे। देश और विदेश के प्रमुख नेताओं और पत्रों ने अंग्रेज़ी सरकार के इस काले कारनामे की तीव्र निंदा की।
वर्ष घटनाक्रम
1919 वर्ष 1919 से लगाये गये 'शासन सुधार अधिनियमों' की जांच के लिए फ़रवरी 1928 में 'साइमन कमीशन' मुम्बई पहुंचा। पूरे भारत देश में इसका व्यापक विरोध हुआ।
1926 भगतसिंह ने लाहौर में 'नौजवान भारत सभा' का गठन किया । यह सभा धर्मनिरपेक्ष संस्था थी।
1927दशहरे वाले दिन छल से भगतसिंह को गिरफ़्तार कर लिया गया। झूठा मुक़दमा चला किन्तु वे भगतसिंह पर आरोप सिद्ध नहीं कर पाए, मजबूरन भगतसिंह को छोड़ना पड़ा ।
1927 'काकोरी केस' में रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला, राजेन्द्र लाहिड़ी और रोशनसिंह को फांसी दे दी गई ।
सितंबर, 1928 क्रांतिकारियों की बैठक दिल्ली के फिरोजशाह के खण्डरों में हुई, जिसमें भगतसिंह के परामर्श पर 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' का नाम बदलकर 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन' कर दिया गया ।
30 अक्टूबर, 1928 कमीशन लाहौर पहुंचा। लाला लाजपत राय के नेतृत्व में कमीशन के विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन हुआ। जिसमें लाला लाजपतराय पर लाठी बरसायी गयीं। वे ख़ून से लहूलुहान हो गए। भगतसिंह ने यह सब अपनी आंखों से देखा।
17 नवम्बर, 1928 लाला जी का देहान्त हो गया। भगतसिंह बदला लेने के लिए तत्पर हो गए। लाला लाजपतराय की हत्या का बदला लेने के लिए 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' ने भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव, आज़ाद और जयगोपाल को यह कार्य दिया। क्रांतिकारियों ने साण्डर्स को मारकर लालाजी की मौत का बदला लिया।
8 अप्रैल, 1929 भगतसिंह ने निश्चित समय पर असेम्बली में बम फेंका। दोनों ने नारा लगाया 'इन्कलाब ज़िन्दाबाद'… ,अनेक पर्चे भी फेंके, जिनमें जनता का रोष प्रकट किया गया था। बम फेंककर इन्होंने स्वयं को गिरफ़्तार कराया। अपनी आवाज़ जनता तक पहुंचाने के लिए अपने मुक़दमे की पैरवी उन्होंने खुद की।
7 मई, 1929 भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त के विरूद्ध अदालत का नाटक शुरू हुआ ।
6 जून, 1929 भगतसिंह ने अपने पक्ष में वक्तव्य दिया

जिसमें भगतसिंह ने स्वतंत्रता, साम्राज्यवाद, क्रांति पर विचार रखे और क्रांतिकारियों के विचार सारी दुनिया के सामने आये।
12 जून, 1929 सेशन जज ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 307 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 3 के अंतर्गत आजीवन कारावास की सज़ा दी। इन्होंने सेशन जज के निर्णय के विरुध्द लाहौर हाइकोर्ट में अपील की। यहाँ भगतसिंह ने पुन: अपना भाषण दिया ।
13 जनवरी, 1930 हाईकोर्ट ने सेशन जज के निर्णय को मान्य ठहराया। इनके मुक़दमे को ट्रिब्यूनल के हवाले कर दिया ।
5 मई, 1930 पुंछ हाउस, लाहौर में मुक़दमे की सुनवाई शुरू की गई। आज़ाद ने भगतसिंह को जेल से छुड़ाने की योजना भी बनाई।
28 मई, 1930 भगवतीचरण बोहरा बम का परीक्षण करते समय घायल हो गए। उनकी मृत्यु हो जाने से यह योजना सफल नहीं हो सकी। अदालत की कार्रवाई लगभग तीन महीने तक चलती रही ।
मई 1930 'नौजवान भारत सभा' को गैर-क़ानूनी घोषित कर दिया गया।
26 अगस्त, 1930 अदालत ने भगतसिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 129, 302 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 तथा 6 एफ तथा भारतीय दण्ड संहिता की धारा 120 के अंतर्गत अपराधी सिध्द किया।
7 अक्तूबर, 1930 68 पृष्ठों का निर्णय दिया, जिसमें भगतसिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फांसी की सज़ा दी गई। लाहौर में धारा 144 लगा दी गई ।
नवम्बर 1930 प्रिवी परिषद में अपील दायर की गई परन्तु यह अपील 10 जनवरी, 1931 को रद्द कर दी गई। प्रिवी परिषद में अपील रद्द किए जाने पर भारत में ही नहीं, विदेशों में भी लोगों ने इसके विरुद्ध आवाज़ उठाई ।
24 मार्च, 1931 फाँसी का समय प्रात:काल 24 मार्च, 1931 निर्धारित हुआ था।
23 मार्च, 1931 सरकार ने 23 मार्च को सायंकाल 7.33 बजे, उन्हें एक दिन पहले ही प्रात:काल की जगह संध्या समय तीनों देशभक्त क्रांतिकारियों को एक साथ फाँसी दी। भगतसिंह तथा उनके साथियों की शहादत की खबर से सारा देश शोक के सागर में डूब चुका था। मुम्बई, मद्रास तथा कलकत्ता जैसे महानगरों का माहौल चिन्तनीय हो उठा। भारत के ही नहीं विदेशी अखबारों ने भी अंग्रेज़ सरकार के इस कृत्य की बहुत आलोचनाएं कीं।
अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य

जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है –
भगतसिंह एक प्रतीक बन गया । साण्डर्स के कत्ल का कार्य तो भुला दिया गया लेकिन चिह्न शेष बना रहा और कुछ ही माह में पंजाब का प्रत्येक गांव और नगर तथा बहुत कुछ उत्तरी भारत उसके नाम से गूंज उठा । उसके बारे में बहुत से गीतों की रचना हुई और इस प्रकार उसे जो लोकप्रियता प्राप्त हुई । वह आश्चर्यचकित कर देने वाली थी

वह शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की यह पंक्तियां गाते थे–
मेरा रंग दे बसंती चोला ।
इसी रंग में रंग के शिवा ने मां का बंधन खोला ॥
मेरा रंग दे बसंती चोला
यही रंग हल्दीघाटी में खुलकर था खेला ।
नव बसंत में भारत के हित वीरों का यह मेला
मेरा रंग दे बसन्ती चोला।
अंग्रेज़ों से बचने के लिए भगतसिंह ने भेष बदला। उन्होंने अपने केश और दाढ़ी कटवाकर, पैंट पहनी और हैट लगाकर अंग्रेज़ों की आंखों में धूल झोंक कर कलकत्ता पहुंचे । कुछ दिन बाद वे आगरा गए।
'हिन्दुस्तान समाजवादी गणतंत्र संघ' की केन्द्रीय कार्यकारिणी की सभा में 'पब्लिक सेफ्टी बिल' और 'डिस्प्यूट्स बिल' के विरोध में भगतसिंह ने 'केन्द्रीय असेम्बली' में बम फेंकने का प्रस्ताव रखा । भगतसिंह के सहायक बटुकेश्वर दत्त बने ।
पिस्तौल और पुस्तक भगतसिंह के दो परम विश्वसनीय मित्र थे।
जेल में पुस्तकें पढक़र ही वे अपने समय का सदुपयोग करते थे, जेल की कालकोठरी में उन्होंने कुछ पुस्तकें भी लिखी-
आत्मकथा, दि डोर टू डेथ (मौत के दरवाज़े पर),
आइडियल ऑफ सोशलिज्म (समाजवाद का आदर्श),
स्वाधीनता की लड़ाई में पंजाब का पहला उभार।
भगतसिंह की शौहरत से प्रभावित होकर डॉ. पट्टाभिसीतारमैया ने लिखा है —
यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि भगतसिंह का नाम भारत में उतना ही लोकप्रिय था, जितना कि गांधी का।
लाहौर के उर्दू दैनिक समाचारपत्र 'पयाम' ने लिखा था —
हिन्दुस्तान इन तीनों शहीदों को पूरे ब्रितानिया से ऊंचा समझता है। अगर हम हज़ारों-लाखों अंग्रेज़ों को मार भी गिराएं, तो भी हम पूरा बदला नहीं चुका सकते।
यह बदला तभी पूरा होगा, अगर तुम हिन्दुस्तान को आज़ाद करा लो, तभी ब्रितानिया की शान मिट्टी में मिलेगी। ओ ! भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव, अंग्रेज़ खुश हैं कि उन्होंने तुम्हारा ख़ून कर दिया। लेकिन वो ग़लती पर हैं। उन्होंने तुम्हारा ख़ून नहीं किया, उन्होंने अपने ही भविष्य में छुरा घोंपा है।
तुम ज़िन्दा हो और हमेशा ज़िन्दा रहोगे।

सिर्फ फांसी नहीं थी, जानिए भगत सिंह की मौत का सच!

फांसी के बाद की सुबह
यह 24 मार्च 1931 की सुबह थी। और लोगों में एक अजीब सी बेचैनी थी। एक खबर लोग आसपास से सुन रहे थे और उसका सच जानने के लिए यहां-वहां भागे जा रहे थे। और अखबार तलाश रहे थे।

यह खबर थी सरदार भगत सिंह और उनके दो साथी सुखदेव और राजुगुरु की फांसी की। उस सुबह जिन लोगों को अखबार मिला उन्होंने काली पट्टी वाली हेडिंग के साथ यह खबर पढ़ी कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर सेंट्रल जेल में पिछली शाम 7:33 पर फांसी दे दी गई। वह सोमवार का दिन था।

ऐसा कहा जाता है कि उस शाम जेल में पंद्रह मिनट तक इंकलाब जिंदाबाद के नारे गूंज रहे थे।

केंद्रीय असेम्बली में बम फेंकने के जिस मामले में भगत सिंह को फांसी की सजा हुई थी उसकी तारीख 24 मार्च तय की गई थी। लेकिन उस समय के पूरे भारत में इस फांसी को लेकर जिस तरह से प्रदर्शन और विरोध जारी था उससे सरकार डरी हुई थी। और उसी का नतीजा रहा कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को चुपचाप तरीके से तय तारीख से एक दिन पहले ही फांसी दे दी गई।

फांसी के समय जो कुछ आधिकारिक लोग शामिल थे उनमें यूरोप के डिप्टी कमिश्नर भी शामिल थे। जितेंदर सान्याल की लिखी किताब 'भगत सिंह' के अनुसार ठीक फांसी पर चढ़ने के पहले के वक्त भगत सिंह ने उनसे कहा, 'मिस्टर मजिस्ट्रेट आप बेहद भाग्यशाली हैं कि आपको यह देखने को मिल रहा है कि भारत के कांतिकारी किस तरह अपने आदर्शों के लिए फांसी पर भी झूल जाते हैं।'

ये भगत सिंह के आखिरी वाक्य थे। लेकिन भगत सिंह, सुखदेव राजगुरू की मौत के बारे में सिर्फ इतना जानना कि उन्हें फांसी हुई थी, या तय तारीख से एक दिन पहले हुई थी काफी नहीं होगा। आगे पढ़िए कि 23 मार्च की उस शाम हुआ क्या था।

फांसी के दिन क्या हुआ
जिस वक्त भगत सिंह जेल में थे उन्होंने कई किताबें पढ़ीं। 23 मार्च 1931 को शाम करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फांसी दे दी गई।

फांसी पर जाने से पहले वे लेनिन की जीवनी ही पढ़ रहे थे।

जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनकी फांसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- "ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।" फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले - "ठीक है अब चलो।"

फांसी पर जाते समय भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू तीनों मस्ती से गा रहे थे -
मेरा रंग दे बसन्ती चोला, मेरा रंग दे;
मेरा रंग दे बसन्ती चोला। माय रंग दे बसन्ती चोला।।

फांसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाये इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किये फिर इसे बोरियों में भरकर फिरोजपुर की ओर ले गये जहां मिट्टी का तेल डालकर इनको जलाया जाने लगा।

गांव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आये। इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंका और भाग गये। जब गांव वाले पास आये तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया।
मृत्यु पर विवाद
हालांकि अभी तक भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की फांसी विवादित है। इस बारे में हर जगह एक सी जानकारियां नहीं मिलतीं। लेकिन कई किताबों और फिल्मों में यह जानकारी साफ तरह से है कि 23 तारीख को आखिर क्या हुआ था।

2002 में राजकुमार संतोषी की डायरेक्ट की गई फिल्म 'द लीजेंड ऑफ सिंह' में भी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की फांसी के बारे में यह हिस्सा दिखाया गया है।

फिल्म में यह दिखाया गया है कि भगत सिंह के परिवार और बाकी लोगों को किसी तरह इस बात की जानकारी मिल जाती है कि तीनों क्रांतिकारियों को सजा की तय तारीख से एक दिन पहले ही फांसी दी जा रही है।

फिल्म के दृष्य के अनुसार परिवार और बाकी लोग जेल के बाहर प्रदर्शन कर रहे होते हैं और अंदर उन्हें फांसी दे दी जाती है। जब लोग जेल के अंदर घुसने की कोशिश करते हैं तो उन तीनों की लाश को दूसरे गेट से बोरे में भरकर बाहर निकाला जाता है।

लेकिन प्रदर्शनकारी उन तक पहुंच जाते हैं। फिल्म में इस दृश्य के अंत में यह भी दिखाया गया है कि किस तरह ब्रिटिश पुलिस उन तीनों की लाश के टुकड़े कर उन्हें जला देती है।
क्यों हुई थी सजा
अंग्रेज़ सरकार दिल्ली की असेंबली में 'पब्लिक सेफ्टी बिल' और 'ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल' लाने की तैयारी में थी। ये बहुत ही दमनकारी क़ानून थे और सरकार इन्हें पास करने का फैसला कर चुकी थी।

शासकों का इस बिल को क़ानून बनाने के पीछे उद्देश्य था कि जनता में क्रांति का जो बीज पनप रहा है, उसे अंकुरित होने से पहले ही समाप्त कर दिया जाए। गंभीर विचार-विमर्श के पश्चात 8 अप्रैल,1929 का दिन असेंबली में बम फेंकने के लिए तय हुआ और इस कार्य के लिए भगत सिंह एवं बटुकेश्र्वर दत्त निश्चित हुए।

इस बमकांड का उद्देश्य किसी को हानि पहुँचाना नहीं था। इसलिए बम भी असेम्बली में ख़ाली स्थान पर ही फेंका गया था। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त बम फेंकने के बाद वहाँ से भागे नहीं, बल्कि स्वेच्छा से अपनी गिरफ्तारी दे दी। इस समय इन्होंने वहाँ पर्चे भी बाटें, जिसका प्रथम वाक्य था कि- बहरों को सुनाने के लिये विस्फोट के बहुत ऊँचे शब्द की आवश्यकता होती है। कुछ सुराग मिलने के बाद 'लाहौर षड़यन्त्र' केस के नाम से मुकदमा चला।

7 अक्टूबर, 1930 को फैसला सुनाया गया, जिसके अनुसार राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह को फांसी की सज़ा दी गई। बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावाज की सजा सुनाई गई थी।

वंदेमातरम्
जय हिन्द

मेरे आदर्श भगत सिंह जी का पत्र

भगतसिंह (1929)

भगत सिंह का पत्र सुखदेव के नाम

भगत सिंह लाहौर के नेशनल कॉलेज के छात्र थे। एक सुंदर-सी लड़की आते जाते उन्हें देखकर मुस्कुरा देती थी और सिर्फ भगत सिंह की वजह से वह भी क्रांतिकारी दल के करीब आ गयी। जब असेंबली में बम फेंकने की योजना बन रही थी तो भगत सिंह को दल की जरूरत बताकर साथियों ने उन्हें यह जिम्मेदारी सौपने से इंकार कर दिया। भगत सिंह के अंतरंग मित्र सुखदेव ने उन्हें ताना मारा कि तुम मरने से डरते हो और ऐसा उस लड़की की वजह से है। इस आरोप से भगत सिंह का हृदय रो उठा और उन्होंने दोबारा दल की मीटिंग बुलाई और असेंबली में बम फेंकने का जिम्मा जोर देकर अपने नाम करवाया। आठ अप्रैल, 1929 को असेंबली में बम फेंकने से पहले सम्भवतः 5 अप्रैल को दिल्ली के सीताराम बाजार के घर में उन्होंने सुखदेव को यह पत्र लिखा था जिसे शिव वर्मा ने उन तक पहुँचाया। यह 13 अप्रैल को सुखदेव के गिरफ़्तारी के वक्त उनके पास से बरामद किया गया और लाहौर षड्यंत्र केस में सबूत के तौर पर पेश किया गया।
प्रिय भाई,
जैसे ही यह पत्र तुम्हे मिलेगा, मैं जा चुका होगा-दूर एक मंजिल की तरफ। मैं तुम्हें विश्वास दिलाना चाहता हूं कि आज बहुत खुश हूं। हमेशा से ज्यादा। मैं यात्रा के लिए तैयार हूं, अनेक-अनेक मधुर स्मृतियों के होते और अपने जीवन की सब खुशियों के होते भी, एक बात जो मेरे मन में चुभ रही थी कि मेरे भाई, मेरे अपने भाई ने मुझे गलत समझा और मुझ पर बहुत ही गंभीर आरोप लगाए- कमजोरी का। आज मैं पूरी तरह संतुष्ट हूं। पहले से कहीं अधिक। आज मैं महसूस करता हूं कि वह बात कुछ भी नहीं थी, एक गलतफहमी थी। मेरे खुले व्यवहार को मेरा बातूनीपन समझा गया और मेरी आत्मस्वीकृति को मेरी कमजोरी। मैं कमजोर नहीं हूं। अपनों में से किसी से भी कमजोर नहीं।
भाई! मैं साफ दिल से विदा होऊंगा। क्या तुम भी साफ होगे? यह तुम्हारी बड़ी दयालुता होगी, लेकिन ख्याल रखना कि तुम्हें जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहिए। गंभीरता और शांति से तुम्हें काम को आगे बढ़ाना है, जल्दबाजी में मौका पा लेने का प्रयत्न न करना। जनता के प्रति तुम्हारा कुछ कर्तव्य है, उसे निभाते हुए काम को निरंतर सावधानी से करते रहना।
सलाह के तौर पर मैं कहना चाहूँगा की शास्त्री मुझे पहले से ज्यादा अच्छे लग रहे हैं। मैं उन्हें मैदान में लाने की कोशिश करूँगा,बशर्ते की वे स्वेच्छा से, और साफ़ साफ़ बात यह है की निश्चित रूप से, एक अँधेरे भविष्य के प्रति समर्पित होने को तैयार हों। उन्हें दूसरे लोगों के साथ मिलने दो और उनके हाव-भाव का अध्यन्न होने दो। यदि वे ठीक भावना से अपना काम करेंगे तो उपयोगी और बहुत मूल्यवान सिद्ध होंगे। लेकिन जल्दी न करना। तुम स्वयं अच्छे निर्णायक होगे। जैसी सुविधा हो, वैसी व्यवस्था करना। आओ भाई, अब हम बहुत खुश हो लें।
खुशी के वातावरण में मैं कह सकता हूं कि जिस प्रश्न पर हमारी बहस है, उसमें अपना पक्ष लिए बिना नहीं रह सकता। मैं पूरे जोर से कहता हूं कि मैं आशाओं और आकांक्षाओं से भरपूर हूं और जीवन की आनंदमयी रंगीनियों ओत-प्रोत हूं, पर आवश्यकता के वक्त सब कुछ कुर्बान कर सकता हूं और यही वास्तविक बलिदान है। ये चीजें कभी मनुष्य के रास्ते में रुकावट नहीं बन सकतीं, बशर्ते कि वह मनुष्य हो। निकट भविष्य में ही तुम्हें प्रत्यक्ष प्रमाण मिल जाएगा।
किसी व्यक्ति के चरित्र के बारे में बातचीत करते हुए एक बात सोचनी चाहिए कि क्या प्यार कभी किसी मनुष्य के लिए सहायक सिद्ध हुआ है? मैं आज इस प्रश्न का उत्तर देता हूँ – हाँ, यह मेजिनी था। तुमने अवश्य ही पढ़ा होगा की अपनी पहली विद्रोही असफलता, मन को कुचल डालने वाली हार, मरे हुए साथियों की याद वह बर्दाश्त नहीं कर सकता था। वह पागल हो जाता या आत्महत्या कर लेता, लेकिन अपनी प्रेमिका के एक ही पत्र से वह, यही नहीं कि किसी एक से मजबूत हो गया, बल्कि सबसे अधिक मजबूत हो गया।
जहां तक प्यार के नैतिक स्तर का संबंध है, मैं यह कह सकता हूं कि यह अपने में कुछ नहीं है, सिवाए एक आवेग के, लेकिन यह पाशविक वृत्ति नहीं, एक मानवीय अत्यंत मधुर भावना है। प्यार अपने आप में कभी भी पाशविक वृत्ति नहीं है। प्यार तो हमेशा मनुष्य के चरित्र को ऊपर उठाता है। सच्चा प्यार कभी भी गढ़ा नहीं जा सकता। वह अपने ही मार्ग से आता है, लेकिन कोई नहीं कह सकता कि कब?
हाँ, मैं यह कह सकता हूँ कि एक युवक और एक युवती आपस में प्यार कर सकते हैं और वे अपने प्यार के सहारे अपने आवेगों से ऊपर उठ सकते हैं, अपनी पवित्रता बनाये रख सकते हैं। मैं यहाँ एक बात साफ़ कर देना चाहता हूँ की जब मैंने कहा था की प्यार इंसानी कमजोरी है, तो यह एक साधारण आदमी के लिए नहीं कहा था, जिस स्तर पर कि आम आदमी होते हैं। वह एक अत्यंत आदर्श स्थिति है, जहाँ मनुष्य प्यार-घृणा आदि के आवेगों पर काबू पा लेगा, जब मनुष्य अपने कार्यों का आधार आत्मा के निर्देश को बना लेगा, लेकिन आधुनिक समय में यह कोई बुराई नहीं है, बल्कि मनुष्य के लिए अच्छा और लाभदायक है। मैंने एक आदमी के एक आदमी से प्यार की निंदा की है, पर वह भी एक आदर्श स्तर पर। इसके होते हुए भी मनुष्य में प्यार की गहरी भावना होनी चाहिए, जिसे की वह एक ही आदमी में सिमित न कर दे बल्कि विश्वमय रखे।
मैं सोचता हूँ,मैंने अपनी स्थिति अब स्पष्ट कर दी है.एक बात मैं तुम्हे बताना चाहता हूँ की क्रांतिकारी विचारों के होते हुए हम नैतिकता के सम्बन्ध में आर्यसमाजी ढंग की कट्टर धारणा नहीं अपना सकते। हम बढ़-चढ़ कर बात कर सकते हैं और इसे आसानी से छिपा सकते हैं, पर असल जिंदगी में हम झट थर-थर कांपना शुरू कर देते हैं।
मैं तुम्हे कहूँगा की यह छोड़ दो। क्या मैं अपने मन में बिना किसी गलत अंदाज के गहरी नम्रता के साथ निवेदन कर सकता हूँ की तुममे जो अति आदर्शवाद है, उसे जरा कम कर दो। और उनकी तरह से तीखे न रहो, जो पीछे रहेंगे और मेरे जैसी बिमारी का शिकार होंगे। उनकी भर्त्सना कर उनके दुखों-तकलीफों को न बढ़ाना। उन्हें तुम्हारी सहानभूति की आवशयकता है।
क्या मैं यह आशा कर सकता हूं कि किसी खास व्यक्ति से द्वेष रखे बिना तुम उनके साथ हमदर्दी करोगे, जिन्हें इसकी सबसे अधिक जरूरत है? लेकिन तुम तब तक इन बातों को नहीं समझ सकते जब तक तुम स्वयं उस चीज का शिकार न बनो। मैं यह सब क्यों लिख रहा हूं? मैं बिल्कुल स्पष्ट होना चाहता था। मैंने अपना दिल साफ कर दिया है।
तुम्हारी हर सफलता और प्रसन्न जीवन की कामना सहित,
तुम्हारा भाई
भगत सिंह
Date Written: 5th April, 1929
Author: Bhagat Singh
Title: Letter to Sukhdev (Bhagat Singh ka patra Sukhdev ke nam)
Source: This letter deals with the views of Bhagat Singh on the question of love and sacrifice in the life of a revolutionary. It was written on April 5, 1929 in Sita Ram Bazaar House, Delhi. The letter was taken to Lahore by Shri Shiv Verma and handed over to Sukhdev it was recovered from him at the time of his arrest on April 13 and was produced as one of the exhibits in Lahore Conspiracy Case.
भगतसिंह

पूर्ण सत्य

अर्धसत्य व पूर्ण सत्य

आइये समाज में फैले इस षड्यंत्र तंत्र से अवगत कराएँ और कुछ षड्यंत्रों पर प्रकाश डाले

१. अर्धसत्य ---फलां - फलां तेल में कोलेस्ट्रोल नहीं होता है ?
पूर्णसत्य --- किसी भी तेल में कोलेस्ट्रोल नहीं होता ये केवल यकृत में बनता है ।

२. अर्धसत्य ---सोयाबीन में भरपूर प्रोटीन होता है ?
पूर्णसत्य---सोयाबीन सूअर का आहार है मनुष्य के खानेलायक नहीं है भारत में अन्न की कमी नहीं है , इसे सूअर आसानी से पचा सकता है, मनुष्य नहीं, जिन देशों में 8 -9 महीने ठण्ड रहती है वहां सोयाबीन जैसे आहार चलते है ।

३. अर्धसत्य--- घी पचने में भारी होता है
पूर्णसत्य---बुढ़ापे में मस्तिष्क आँतों और संधियों (joints) में रूखापन आने लगता है इसलिए घी खाना बहुत जरुरी होता है और भारत में घी का अर्थ देशी गाय के घी से ही होता है

४. अर्धसत्य---घी खाने से मोटापा बढ़ता है ?
पूर्णसत्य---( षड्यंत्र प्रचार ) ताकि लोग घी खाना बंद कर दें और अधिक से अधिक गाय मांस की मंडियों तक पहुंचे, जो व्यक्ति पहले पतला हो और बाद में मोटा हो जाये वह घी खाने से पतला हो जाता है ?

५. अर्धसत्य---घी हृदय के लिए हानिकारक है ?
पूर्णसत्य---देशी गाय का घी हृदय के लिए अमृत है पंचगव्य में इसका स्थान है ।

६. अर्धसत्य---डेयरी उद्योग दुग्ध उद्योग है ?
पूर्णसत्य---डेयरी उद्योग मांस उद्योग है यंहा बछड़ो और बैलों को, कमजोर और बीमार गायों को, और दूध देना बंद करने पर स्वस्थ गायों को कत्लखानों में भेज दिया जाता है दूध डेयरी का गौण उत्पाद है ।

७. अर्धसत्य---आयोडाईज नमक से आयोडीन की कमी पूरी होती है ?
पूर्णसत्य---आयोडाईज नमक का कोई इतिहास नहीं है, ये पश्चिम का कंपनी षड्यंत्र है आयोडाईज नमक में आयोडीन नहीं पोटेशियम आयोडाइज होता है जो भोजन पकाने पर गर्म करते समय उड़ जाता है स्वदेशी जागरण मंच के विरोध के फलस्वरूप सन २००० में भाजपा सरकार ने ये प्रतिबन्ध हटा लिया था लेकिन कांग्रेस ने सत्ता में आते ही इसे फिर से लगा दिया ताकि लूट तंत्र चलता रहे और विदेशी कम्पनियाँ पनपती रहे ।

८. अर्धसत्य--- शक्कर (चीनी ) का कारखाना ?
पूर्णसत्य--- शक्कर (चीनी ) का कारखाना इस नाम की आड़ में चलने वाला शराब का कारखाना शक्कर इसका गौण उत्पाद है ।

९. अर्धसत्य---शक्कर (चीनी ) सफ़ेद जहर है
पूर्णसत्य--- रासायनिक प्रक्रिया के कारन कारखानों में बनी सफ़ेद शक्कर (चीनी) जहर है पम्परागत शक्कर एकदम सफ़ेद नहीं होती थोडा हल्का भूरा रंग लिए होती है ।

१०. अर्धसत्य--- फ्रिज में आहार ताज़ा होता है ?
पूर्णसत्य--- फ्रिज में आहार ताज़ा दीखता है पर होता नहीं है जब फ्रिज का अविष्कार नहीं हुआ था तो इतनी देर रखे हुए खाने को बासी या सडा हुआ खाना कहते थे ।

११. अर्धसत्य--- चाय से ताजगी आती है ?
पूर्णसत्य--- गरम पानी से आती है ताजगी, चाय तो केवल नशा (निकोटिन) है ।

१२. अर्धसत्य---एलोपैथी स्वास्थ्य विज्ञानं है ?
पूर्णसत्य---एलोपैथी स्वास्थ्य विज्ञानं नहीं चिकित्सा विज्ञानं है ।

१३. अर्धसत्य---एलोपैथी विज्ञानं ने बहुत तरक्की की है ?
पूर्णसत्य--- दवाई कंपनियों ने बहुत तरक्की की है एलोपैथी में मूल दवाइयां 480 - 520 हैं जबकि बाज़ार में
1,००,००० से अधिक दवाइयां बिक रही है ।

१४. अर्धसत्य--- बैक्टीरिया वायरस के कारण रोग होते हैं ?
पूर्णसत्य--- शरीर में बैक्टीरिया वायरस के लायक वातावरण तैयार होने पर रोग होते हैं ।

१५. अर्धसत्य--- भारत में लोकतंत्र है जनता के हितों का ध्यान रखने वाली जनता द्वारा चुनी हुई सरकार है ?
पूर्णसत्य--- भारत में लोकतंत्र नहीं कंपनी तन्त्र है बहुत से सांसद, मंत्री, प्रशासनिक अधिकारी कंपनियों के दलाल हैं उनकी भी नौकरियां करते हैं उनके अनुसार नीतियाँ बनाते हैं, वे जनहित में नहीं कंपनी हित में निर्णय लेते हैं भोपाल गैस कांड से बड़ा उदहारण क्या हो सकता है जंहा एक अपराधी मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के आदेशानुसार फरार हो सका । यदि लोकतंत्र होता तो उसे पकड कर वापस
जेल में डाल देते ।

१६. अर्धसत्य--- आज के युग में मार्केटिंग का बहुत विकास हो गया है ?
पूर्णसत्य--- मार्केटिंग का नहीं ठगी का विकास हो गया है माल गुणवत्ता के आधार पर नहीं विभिन्न प्रलोभनों व जुए के द्वारा बेचा जाता है जैसे क्रीम गोरा बनती है भाई कोई भैंस को गोरा बना के दिखाओ ?

१७. अर्धसत्य--- टीवी मनोरंजन के लिए घर घर तक पहुँचाया गया है ?
पूर्णसत्य--- जब टी वी नहीं था तब लोगों का जीवन देखो और आज देखो जो आज इन्टरनेट पर बैठे सुलभता से जीवन जी रहे हैं उन्हें अहसास नहीं होगा कंपनियों का माल बिकवाने और परिवार व्यवस्था को तोड़ने, इसाईवाद का प्रचार करने के लिए टी वी घर घर तक पहुँचाया जाता है ।

१८. अर्धसत्य--- टूथपेस्ट से दांत साफ होते हैं ?
पूर्णसत्य--- टूथपेस्ट करने वाले यूरोप में हर तीन में से एक के दांत ख़राब हैं दंतमंजन करने से दांत साफ होते हैं मंजन -मांजना, क्या बर्तन ब्रश से साफ होते हैं ? मसूड़ों की मालिश करने से दांतों की जड़ें मजबूत भी होती हैं

१९. अर्धसत्य--- साबुन मैल साफ कर त्वचा की रक्षा करता है ?
पूर्णसत्य--- साबुन में स्थित केमिकल (कास्टिक सोडा, एस. एल. एस.) और चर्बी त्वचा को नुकसान पहुंचाते हैं, और डाक्टर इसीलिए चरम रोग होने पर साबुन लगाने से मना करते हैं साबुन में गौ की चर्बी पाए जाने पर विरोध होने से पहले हिंदुस्तान लीवर हर साबुन में गाय की चर्बी पाई गई थी |

Saturday, 16 May 2015

आप पार्टी का सच्च


गजेन्द्र किसान की आत्महत्या

गजेन्द्र किसान की आत्महत्या, आत्महत्या नहीं हत्या है क्यूंकि आत्म हत्या की कोशिश उस किसान गजेन्द्र ने सबके सामने की, किसी ने नहीं रोका। घटनास्थल पर सबसे ज्यादा संख्या आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं की थी – हजारों में, उसके बाद 20-25 के आसपास गेस्ट टीचर थे, फिर उनसे पीछे या बीच में 70-80 मीडियाकर्मी खड़े थे|

दिल्ली पुलिस ने आम आदमी पार्टी को रैली की मंजूरी नहीं दी थी|

ध्यान रहे दिल्ली पुलिस ने आम आदमी पार्टी को रैली की मंजूरी नहीं दी थी| यदि एक आम सभा या रैली की अनुमति नहीं ली जाती है तो दिल्ली पुलिस के रक्षा बेडा, इमरजेंसी व्हीकल्स, तथा अन्य प्रबंधन के इंतजाम वहां नहीं व्यवस्थित नहीं किये जाते हैं| आम आदमी पार्टी की सरकार होने के कारण तथा दिल्ली के मुख्यमंत्री के रैली में होने के कारण ही वहां कुछ ही पुलिसकर्मी मौजूद थे जिनके पास उपरोक्त व्यवस्थाएं हाथोंहाथ उपलब्ध नहीं थी|

अरविन्द केजरीवाल और उनकी पार्टी पहले भारतीय संसद का घेराव करना चाहती थी मगर धारा १४१ लगी होने के कारण ऐसा नहीं हो पाया| तब दिल्ली पुलिस ने उन्हें तत्काल ट्रैफिक पुलिस से बात कर रामलीला मैदान में रैली करने की लिखित इजाजत करने को कहा| साथ ही दिल्ली पुलिस ने यह भी कहा कि हमें इनपुट मिली है कि कुछ अप्रिय घटना हो सकती आप पूरी मंजूरी लेकर ही रामलीला मैदान में रैली करें, हम पूरी जिम्मेदारी लेंगे| मगर आम आदमी पार्टी के कानों पर जूँ नहीं रेंगी|

आम आदमी पार्टी ने पहले तो जन्तर मंतर को २३ अप्रैल २०१५ को रैली वाले दिन ही अपनी रैली करने के लिए चुना, दिल्ली पुलिस से बात कर मंजूरी लेने के बजे इसकी सूचना इसी दिन मीडिया को दे दी गयी| साथ ही रैली की पूर्व संध्या यानि २२ अप्रैल २०१४ को आम आदमी पार्टी की सरकार ने दिल्ली सरकार के लैटर पैड पर एक पत्र लिख दिल्ली पुलिस को मीडिया से दूर रखने के लिए कहा| क्या यह कोई पूर्वनियोजित योजना का अंदेशा था?

नैतिक सवाल

यदि कोई किसी के समक्ष या पूरी भीड़ के सामने आत्महत्या कर रहा हो, तो क्या आप पहले उसका रजिनैतिक फायदा लेने की सोचेंगे, उससे सवाल जवाब करेंगे कि आत्म हत्या क्यूँ कर रहे हो या उसे आत्महत्या करने से रोकोगे? फैसला आपका?

मगर इस तथाकथित रैली में एक राजनैतिक पार्टी एवं उसके कार्यकर्ताओं ने एक किसान को आत्महत्या करने दिया या उसकी आत्महत्या को अपनी मूक सहमती दी| अब इस पर जनता क्या बोलती या सोचती है यह उसको सोचना है|

इस घटना के बाद लोगो अपने परिवारवालों,  रिश्तेदारों और मित्रों को ऐसी महा रैलियों में भेजने से रोकेंगे, क्या पता कि ऐसा दुबारा हो जाए?

क्या ऐसा पहले कभी हुआ है?

नहीं, ऐसा भारत की राजनीति में पहली बार हुआ है कि एक राजनैतिक पार्टी की रैली में ऐसी आत्महत्या किसी किसान या किसी अन्य व्यक्ति ने की हो| किसी अप्रिय घटना जैसे कि आतंकवादी हमले, दुश्मनों के हमले या भीड़भाड़ की वजह से भगदड़ होने पर रैली को तुरंत स्थगित किया जाता है|

ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी राजनैतिक पार्टी ने अपनी रैली में किसी को विशेष तौर पर बुलाया हो और उसकी लाश वापिस गयी हो|

एक याद

हमें याद है कि भाजपा की मेरठ में रैली हुयी थी जिसमें तब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और वर्तमान के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वहाँ मुख्य तौर पर आमंत्रित थे| उनके मंच से ५०० मीटर दूर एक बिजली के खम्भे पर तीन युवक चढ़े हुए थे| मोदी ने मंच से कहा कि आप तीनों नीचे उतर आयें नहीं तो यह रैली शुरू नहीं होगी और उन्हें चोधरी चरण सिंह की शपथ भी दी थी| उनके बोलते ही कुछ भाजपाई कार्यकर्त्ता और पुलिस सक्रीय हुयी और वो लोग नीचे उतर आये| अगर वो नीचे नहीं उतरते तो मोदी को पैदल चलकर खम्भे तक जाने में शर्म नहीं आती क्यूंकि यही आरएसएस के और भारतीयों के असली संस्कार हैं|

यदि दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल भी कुछ ऐसा ही करते तो शायद आज परिदृश्य अलग होता और उनका भी नाम रोशन होता| मगर, हा दैव| ऐसा कुछ नहीं हुआ|

राजनीति की अंध महत्वकांक्षा

उस किसान की आत्महत्या की कोशिश और मरने के बाद भी रैली में अरविन्द केजरीवाल का भाषण चलता रहा। सुसाइड नॉट बरामद होने पर कुमार विश्वास ने इसे मंच से पढ़कर सुनाया और पुलिस एवम् भाजपा को इसका दोषी ठहराया। गजेन्द्र किसान के मित्र का कहना है कि वो आत्महत्या कर ही नहीं सकता। आम आदमी पार्टी के बुलावे पर वो खुद पैसे लगाकर अपने साथ कई लोगों को ले गया था।


जब एक ऐसे किसान की आत्महत्या, जो किसी और राज्य का हो जहाँ विरोधी पार्टी का शासन है, एक राजनैतिक पार्टी की उस रैली में, जिससे उस पार्टी बहुत लाभ होना है, पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं और समर्थकों के सामने हो और जिसके मरने के बाद भी रैली में भाषण जारी रहे वो भी उसका सुसाइड नोट पढ़; तो उस किसान की

जो किसी और राज्य का हो जहाँ विरोधी पार्टी का शासन है, एक राजनैतिक पार्टी की उस रैली में, जिससे उस पार्टी बहुत लाभ होना है, पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं और समर्थकों के सामने हो और जिसके मरने के बाद भी रैली में भाषण जारी रहे वो भी उसका सुसाइड नोट पढ़; तो उस किसान की मौत का सबसे बड़ा फायदा रैली करने वाली पार्टी को ही होता है।

कायापलट

जो आम आदमी पार्टी अपने कार्यकर्ताओं पर इतना भरोसा करती है कि उन्हें वोटिंग बूथ की सुरक्षा के लिए पुलिस के समानांतर तैनात करती है ताकि वोटिंग बूथ की सुरक्षा की जा सके, मगर उसके कार्यकर्त्ता एक आदमी को पेड़ पर चढाने से रोकते नहीं है और उसे फांसी लगाने की कोशिश करने पर पेड़ से उतारते नहीं है|

जिस आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री पद का दावेदार बिजली के खम्भों पर चढ़ कर बिजली के कनेक्शन चालू या बंद कर सकता है ताकि मुख्यमंत्री बन सके, वो बहुमत पाकर मुख्यमंत्री बनने के बाद ४० मीटर दूर पेड़ पर चढ़े व्यक्ति को पेड़ से उतारने के लिए कुछ कदम पैदल भी नहीं चल सकता|



गजेन्द्र किसान की आत्महत्या से जुड़े कुछ सिलसिलेवार तथ्य

पहले तो आम आदमी पार्टी दिल्ली पुलिस को नहीं मानकर रामलीला मैदान की बजाय जंतर मंतर चुनते हैं।
दिल्ली पुलिस को लिखते हैं कि रैली स्थल से मीडिया को दूर रखा जाये।
आम आदमी पार्टी दो बार विधानसभा का चुनाव लड़ चुके गजेन्द्र सिंह को अपनी पार्टी में शामिल कर विशेष न्योते से दिल्ली बुलाती है।
गजेन्द्र अपने परिवार को कहता है कि आप कि हाई कमांड से यहां खेती की असली तस्वीर बताऊंगा।
गजेन्द्र उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया से मिलने उनके निवास स्थान जाता है, पर नहीं मिल पाता।
गजेन्द्र जंतर मंतर पहुँचता है वहां आप कार्यकर्ताओं से मुख्यमंत्री से मिलने के लिए कहता है।
आप के कार्यकर्त्ता ताली बजा बजा कर उसे उत्साहित कर मंच के सामने के पेड़ पर चढ़ाते हैं वो भी झाड़ू और चुनावी चिन्हों के साथ।
गजेन्द्र दो घंटे तक चिल्लाता रहता है कि केजरीवाल को बुलाओ नहीं तो निचे कूद जाऊंगा।
केजरीवाल जो बिजली के खंभे से चढ़ने से लेकर पद यात्रा तक करते हैं, मात्र 50 मीटर चल कर किसान की बात नहीं सुन सकते।
आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता तब तक आगे बढ़ आते हैं, पेड़ के पास विरोध कर रहे गेस्ट टीचर खड़े हो जाते हैं जो गजेन्द्र को निचे उतरने को कहते हैं।
गेस्ट टीचर सफल नहीं होते, कार्यकर्त्ता उन्हें पेड़ से हटा गजेन्द्र के लिए तालियां बजाते हैं।
दिल्ली पुलिस के कर्मचारी कार्यकर्ताओं को रोकते हैं कि तालियां मत बजाओ।
दिल्ली पुलिस फायर ब्रिगेड को फ़ोन कर सीढ़ी का इंतेज़ाम करने की कोशिश करती हैं।
दिल्ली पुलिस के कर्मचारियों को पेड़ तक कार्यकर्त्ता नहीं पहुँचने देते।
अब तक कुमार विश्वास मंच से गजेन्द्र को देख चुके होते हैं और माइक पर कहते हैं कि पुलिस उसे उतरे मगर कार्यकर्ताओंं को पेड़ के पास से हटने के लिए नहीं कहते।
जब गजेन्द्र लटक रहा होता है तब कुमार विश्वास अपना इस साल का प्रसिद्ध डायलॉग माइक पर बोलते हैं वो भी इशारे के साथ – “लटक गया” (जी न्यूज़ पर दिखाया गया विडियो)
जो सुसाइड नोट मिलता है उस पर किसी और की लिखावट होती है क्यूंकि गजेन्द्र की बेटी मना कर चुकी है कि ये लिखावट गजेन्द्र की नहीं है और उस पर पहले उपेन्द्र नाम लिखा है फिर काट कर गजेन्द्र नाम लिखा है।
गजेन्द्र का सुसाइड नोट सबके सामने माइक पर पढ़ कर सुनाया गया।
क्यों भाई सुसाइड नोट तो तुम्हे और तुम्हारे कार्यकर्ताओं को पुलिस से पहले दिख गया मगर आत्म हत्या करता किसान तुम्हें नहीं दिखा?

गजेन्द्र के फांसी पर लटकने की कोशिश और मरने के बाद भी केजरीवाल और उनकी प्रसिद्ध मंडली भाषण देना और रैली करना बंद नहीं करती।
केजरीवाल कहते हैं कि हस्पताल में जाकर देख लेंगे।
किसान की मृत्यु 2:55 सांय पर घोषित होती है मगर आपिये नेतागण अलका लाम्बा और अन्य 2:20 से ही किसान पर ट्वीट से संवेदना व्यक्त करना शुरू कर देते हैं।
गजेन्द्र की मौत के बाद किसी भी राजनेता को उनसे नहीं मिलने दिया जाता, अजय माकन को हस्पताल से आप कार्यकर्त्ता विरोध कर भगा देते हैं।
बतौर प्रत्यक्षदर्शी कोई आम आदमी पार्टी का नेता या कार्यकर्त्ता गजेन्द्र के बेटे को जो उनकी मौत के बाद भी रैली स्थल पे था, उसे सांत्वना देना तो दूर बात तक नहीं करते।
आम आदमी पार्टी एक राजस्थान के किसान को मरने के बाद 10 लाख तो दे रही है मगर जो किसान अभी भी राजस्थान में बिना सहायता के जीवन यापन कर रहे हैं और आत्म हत्या की कगार पर हैं, उन्हें अपनी रैलियोंं में बुला तो रही है मगर कोई एक रुपये की सहायता नहीं कर रही है।
जब मामला दिल्ली पुलिस में है और उसकी क्राइम ब्रांच इसकी जांच कर रही है तो खुद को दोषी ठहराए जाने से बचने के लिए बिना अधिकार से डिप्टी मजिस्ट्रेट से इसकी अलग जांच करने को कहती है।
आम आदमी पार्टी के नेता और कार्यकर्त्ता खुद गजेन्द्र की खुदखुशी के चीथड़े उड़ा संसद एवं विधानसभा से लेकर सड़क और फेसबुक तक उसका राजनैतिक फायदा लेने में लगे है, मगर दूसरी पार्टियों को ऐसा करने से रोक रहे हैं।
ताज़ा खबर – आवाज़ का राज

ताज़ा समाचार आने तक दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने चौकाने वाले खुलासे किये हैं| गजेन्द्र के मोबाईल के आखिरी लोकेशन कुरुक्षेत्र पाई गयी है जबकि उसका फ़ोन 10 दिन पहले बंद हो गया था| क्या गजेन्द्र के पास मरने के वक्त खुद का फ़ोन था? इसके अलावा दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी ने नवभारतटाइम्स को बताया कि खुदखुशी के इस केस में वो दो आवाजें महतवपूर्ण हैं जब कोई पहले कहता है कि लटक जा… और बाद में लटक गया…| दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने सभी चैनलों से उस दिन की रॉ फुटेज मांगी है|

मरने से पहले लखपति

इसके अलावा गजेन्द्र की बहन ने कहा है कि “जब गजेन्द्र से बात हुयी थी तब उसने कहा था कि उसके पास डेढ़ लाख रुपये हैं जो भतीजी की शादी में काम आयेंगे|” जो किसान kafi  समय से खेती ना कर रहा हो और उसका पैसे को लेकर झगडा हुआ हो, उसके पास मरने से ठीक पहले इतनी राशि होना किसी साजिश की तरफ ही इशारा करता है|

चलते चलते

अजय सीठा जी, जो गजेन्द्र के मित्र के मित्र हैं, फेसबुक पर लिखते हैं कि –

“गजेन्द्र के लिए आत्म हत्या करने की स्तिथि कभी आ ही नहीं सकती थी” – यह कहना है मेरे असीम मित्र कार्तिक बना का , मृतक गजेन्द्र उनके मित्रों में एक थे …… गजेन्द्र सिंग सोलंकी (कल्याणवत ) ग़रीब किसान नहीं बल्कि साफे के कारोबारी और गाँव के ज़मींदार परिवार से थे। स्वाभाव से उत्साही गजेन्द्र सिर्फ अपने साथ गाँव के कुछ किसानो को आम आदमी पार्टी के बुलावे पर अपने खर्च पर दिल्ली लाये थे.सु साइड नोट वाली बात मनघडंत है , उनकी आत्म हत्या करने का कोई कारण ही नहीं बनता बस एक चीज़ जो उनके व्यवहार में थी की वे किसी के लिए कुछ भी कर जाने के लिए तैयार रहते थे , उन्हें ऎसा करने के लिए उकसाया गया होगा , या वो बस डराने / ध्यान आकर्षण कराने के लिए ऎसा कर रहे होंगे / या पेड़ की डाली से उनका पाँव फ़िसला होगा । ज्ञात रहे कि गजेन्द्र सोलंकी सवाई मान सिंग परिवार से सम्बद्ध भवानी सिंग जी और सचिन पाइलट परिवार के करीबी थे !!”


नेताजी के खिलाफ कांग्रेस का दुष्प्रचार


नेताजी के खिलाफ झूठे प्रचार का जवाब

सबसे पहली बात तो यह है कि पत्रकार या तथाकथित लेखक मणिमुग्ध शर्मा जी ने उन्हीं हथकंडों और प्रचार सामग्री का उपयोग किया है जिसका प्रयोग ब्रिटिश हुकूमत नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और उनकी आज़ाद हिन्द फ़ौज़ को बदनाम करने के लिए करती थी।


मगर जब आज़ाद हिन्द फ़ौज़ के सैनिक ब्रितानिया सरकार के युद्धबंदी बनकर भारत पहुंचे और लाल किले की अदालत में उनपर मुकदमा चला तो सारी सच्चाई सामने आ गयी। खुद कभी नेताजी के विरोधी रहे वकील भूला भाई देसाई उनके बहुत बड़े प्रशंसक बन गए थे।

मणिमुग्ध एस शर्मा जी को आखिरकार नेताजी की याद तो आई! यह ब्लॉगपोस्ट उनकी ताज़ी खबर  http://navbharattimes.indiatimes.com/india/netaji-subhas-chandra-bose-wanted-ruthless-dictatorship-in-india-for-20-years/articleshow/46981633.cms का एक जवाब है।



 जब देश में सबको आज़ाद हिन्द फ़ौज़ का सत्य और उसकी कामयाबी मालूम पड़ी तो ब्रिटिश रॉयल आर्मी, रॉयल इंडियन नेवी और रॉयल एयरफोर्स में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत फ़ैल गयी जिसका नतीजा था 1946 की रॉयल इंडियन नेवी म्युटिनी जिसमें 13 जंगी जहाजों ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया था।
आज फिर वही ब्रिटिश प्रोपेगंडा का प्रयोग कर क्या मणिमुग्ध शर्मा अंग्रेज़ों के प्रति अपनी वफ़ादारी का प्रयोग कर रहे हैं?
आरोप – नेताजी ने 1935 में रोम की यात्रा की थी, ताकि अपनी किताब की कॉपी इटली के तानाशाह मुसोलिनी को भेंट कर सकें। नेताजी उसे बहुत पसंद करते थे और उसके ‘आदर्शों’ पर आजीवन चलना चाहते थे।
जवाब – नेताजी सुभाष चन्द्र बोस एक बहुत बड़े बुद्धिजीवी और देशभक्त थे। यूरोप में रहते हुए उन्होंने ना सिर्फ अपनी बीमारी का इलाज किया बल्कि प्रथम विश्व युद्ध के समापन पर हुई 1919 की ट्रीटी ऑफ़ वरसाइल के बाद के यूरोप के बारे में स्वयं जानना चाहते थे। उनकी बीमारी के दौरान ही इंग्लैंड के एक प्रकाशन संस्थान विशार्ट एंड कंपनी ने उन्हें भारत में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में अपने अनुभव संकलित कर एक पुस्तक लिखने के लिए।
 सुभाष चन्द्र बोस ने इसे स्वीकार किया और “इंडियन स्ट्रगल 1920-34″ लिखी। इस पुस्तक को टाइप करवाने के लिए उन्होंने एमिली शेंकल को टाइपिस्ट नियुक्त किया। बुक इंग्लैंड में छपी और तुरंत मशहूर हो गयी। इस पुस्तक में भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का पूर्ण ब्यौरा था। स्वयं तत्कालीन राजनैतिकविद रोमन रोल्लांड को यह पुस्तक बहुत पसंद आई थी और उन्होंने इसे एक ईमानदार लेखन बताया था। बताते चलें कि यह पुस्तक भारत में बैन हो गयी थी परन्तु यूरोप में मौजूद हर देश के राजनीतिज्ञों ने यह पुस्तक पढ़ी और बहुत पसंद करी थी।
यूरोप उस समय इलाज़ के लिए बहुत बड़ा केंद्र बना हुआ था। भारत में किसी भी बड़ी बीमारी के लिए पश्चिमी सभ्यता के डॉक्टर सीधे विएना, स्विट्जरलैंड और रोम के ब्लैक फारेस्ट जाने की सलाह देते थे। चिकित्स्कीय पर्यटन (मेडिकल टूरिज्म) भी रोम जाए बिना पूरा नहीं होता था। और जब एक भारतीय राजनीतिज्ञ रोम जायेगा तो मुसोलिनी की पार्टी का उससे मिलना स्वभाविक था क्यूंकि मुसोलिनी भारत के स्व्तंत्रता संग्राम का समर्थक था और
 ब्रिटिश हुकूमत का शत्रुप्राय। मोहम्मद इक़बाल शैदाई और सरदार अजित सिंह के साथ कई अन्य भारतीय क्रांतिकारियों को मुसोलिनी ने शरण दी थी। ठीक इसके विपरीत जर्मनी अपने ब्रिटिश-समर्थक विचारधारा के कारण कभी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का समर्थक नहीं रहा था। यह भी उल्लेखनीय है कि वीर सावरकर जैसे बहुत से भारतीय क्रन्तिकारी एवं नेतागण इटेलियन क्रांति से प्रभावित थे। अतएव जब सुभाष चन्द्र बोस 1934 में अपने इलाज़ के लिए ब्लैक फारेस्ट गए थे तब वहां उनका संपर्क इटालियन नेताओं से होना स्वभाविक था। बाद में उनके यही इटालियन संपर्क भारत से बनवास में निकालकर जर्मनी जाने के काम आए।
सुभाष चन्द्र बोस की 1934 में हिटलर से कोई मुलाकात नहीं हुयी। बोस इटली और जर्मनी के फासीवाद के ना तो समर्थक थे और ना ही प्रशंसक। अपितु उन्होंने रशिया के कम्युनिज्म और इटली एवं जर्मनी के फासीवाद को मिलाकर एक नयी विचारधारा के जन्म एवं समर्थन की बात कही थी।  नेताजी मुसोलिनी के मात्र प्रशंसक थे क्यूंकि वो यूरोप का एक प्रभावशाली शासक होने के बावजूद भारत के स्वतंत्रता संग्राम का सहयोग करता था। परन्तु कभी नेताजी ने उसके क़दमों पर चलने की बात नहीं कही थी। इसके अलावा नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और वीर दामोदर सावरकर दोनों ही गिउसेप्पे गैरीबाल्डी और मैज़िनी के प्रशंसक थे।

आरोप – उन्होंने अपने आप ही हेड ऑफ स्टेट यानी प्राइम मिनिस्टर, युद्ध मंत्री और विदेश मंत्री की उपाधियां दे दीं।
जवाब – जब खुद इंडिया इंडिपेंडेंस लीग के अध्यक्ष रास बिहारी बोस ने लीग और आज़ाद हिन्द फ़ौज़ का सम्पूर्ण नेतृत्व नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को दिया था, तब और कौन उन्हें क्या उपाधि देता? जापानी सरकार और  इंडिया इंडपेंडेन्स लीग के बीच में ही सारी कार्यवाही होती थी, परन्तु लीग को सरकार का दर्जा हासिल नहीं था। इसलिए नेताजी ने इंडिया  इंडिपेंडेंस लीग के अधीन ही आज़ाद हिन्द सरकार (प्रोविजनल गवर्नमेंट ऑफ़ फ्री इंडिया) का गठन किया था। जब पितृ संस्थान के अधिष्ठाता नेताजी थे तो पुत्र संस्थान के अधिष्ठाता वो क्यों नहीं होंगे? इसके अलावा खुद रास बिहारी बोस ने इस बात का अनुमोदन किया था कि नेताजी ही दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एकमात्र व् सर्वमान्य आधिकारिक नेता होंगे। स्वयं रास बिहारी बोस ने आज़ाद हिन्द सरकार के गठन की पूर्व संध्या पर सूचि देखकर अपना अनुमोदन दिया था कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ही नवीन सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, युद्धमंत्री एवं विदेश मंत्री होंगे। उस समय नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को छोड़कर और कोई बड़े दर्जे का राजनीतिज्ञ वहां नहीं था।

आरोप –  वह चाहते थे कि भारत आजाद हो, तो पहली वाली उपाधि उनके पास रहे।
जवाब – रास बिहारी बोस ने इंडिया इंडिपेंडेंस लीग का गठन किया था जो जापान सरकार पर निर्भर थी। प्रथम आज़ाद हिन्द फ़ौज़ के नाकामयाब होने के बाद रास बिहारी बोस ने जापान सरकार को नेताजी को जर्मनी से तुरंत लाने को कहा। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के आगमन पर तुरंत प्रभाव से रास बिहारी बोस ने इंडिया इंडिपेंडेंस लीग और आज़ाद हिन्द फ़ौज़ की जिम्मेवारी उन्हें सौंप दी थी। क्यूंकि लीग जापान सरकार पर निर्भर थी, इसलिए नेताजी ने बराबरी के लिए आज़ाद हिन्द सरकार का गठन किया था जिसमें आज़ाद हिन्द फ़ौज़ उनकी आर्मी थी जिसमें थल, जल और वायु तीनों टुकड़ियां उसके बाद लगाई गयी थी। आज़ाद हिन्द सरकार के पास एक बैंक भी था – आज़ाद हिन्द बैंक, जिसमें सभी भारतीयों से एकत्रित कर और दान रखा जाता था। सरकार के गठन के बाद जापान से सारी वित्तीय सहायता बैंक द्वारा कर्जे पर ली जाती थी। आज़ाद हिन्द सरकार के प्रतिनिधि के पास जापान सरकार से समझोते करने के लिए पद हो इसके लिए नेताजी को राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री की पदवी लेनी पड़ी।
ध्यान रहे इससे पहले राजा महेंद्र प्रताप ने काबुल में 1915 में फर्स्ट प्रोविज़नल गवर्नमेंट ऑफ़ फ्री इंडिया की स्थापना की थी। ऐसे प्रोविज़नल सरकारों की स्थापना किसी देश की आज़ादी से पहले क्रांतिकारियों द्वारा की जाती हैं ताकि उनका जीते हुए सीमा क्षेत्र में सरकारी व्यवस्था हो और विदेशों से आधिकारिक रूप से मदद ली जा सके। निकट इतिहास में शेख मुजिबर रहमान ने कलकत्ता में प्रोविज़नल गवर्नमेंट ऑफ़ बांग्लादेश बनाई थी, जिसने बांग्लादेश बनने के बाद में अपनी सरकार बांग्लादेश में स्थानांतरित कर ली थी। ध्यान रहे – भारत सरकार और प्रोविज़नल गवर्नमेंट ऑफ़ बांग्लादेश के समझोते के बाद ही भारत पाकिस्तान पर हमला कर बांग्लादेश को आज़ाद करवाने के लिए अधिकृत हुआ था। यदि मुज़बीर रहमान इस प्रोविज़नल सरकार का प्रधानमंत्री नहीं होता तो वो इंदिरा गांधी (तत्कालीन प्रधानमंत्री) से अपने देश को आज़ाद करवाने के लिए आधिकारिक समझौता नहीं कर सकता था।