Saturday, 16 May 2015

आप पार्टी का सच्च


गजेन्द्र किसान की आत्महत्या

गजेन्द्र किसान की आत्महत्या, आत्महत्या नहीं हत्या है क्यूंकि आत्म हत्या की कोशिश उस किसान गजेन्द्र ने सबके सामने की, किसी ने नहीं रोका। घटनास्थल पर सबसे ज्यादा संख्या आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं की थी – हजारों में, उसके बाद 20-25 के आसपास गेस्ट टीचर थे, फिर उनसे पीछे या बीच में 70-80 मीडियाकर्मी खड़े थे|

दिल्ली पुलिस ने आम आदमी पार्टी को रैली की मंजूरी नहीं दी थी|

ध्यान रहे दिल्ली पुलिस ने आम आदमी पार्टी को रैली की मंजूरी नहीं दी थी| यदि एक आम सभा या रैली की अनुमति नहीं ली जाती है तो दिल्ली पुलिस के रक्षा बेडा, इमरजेंसी व्हीकल्स, तथा अन्य प्रबंधन के इंतजाम वहां नहीं व्यवस्थित नहीं किये जाते हैं| आम आदमी पार्टी की सरकार होने के कारण तथा दिल्ली के मुख्यमंत्री के रैली में होने के कारण ही वहां कुछ ही पुलिसकर्मी मौजूद थे जिनके पास उपरोक्त व्यवस्थाएं हाथोंहाथ उपलब्ध नहीं थी|

अरविन्द केजरीवाल और उनकी पार्टी पहले भारतीय संसद का घेराव करना चाहती थी मगर धारा १४१ लगी होने के कारण ऐसा नहीं हो पाया| तब दिल्ली पुलिस ने उन्हें तत्काल ट्रैफिक पुलिस से बात कर रामलीला मैदान में रैली करने की लिखित इजाजत करने को कहा| साथ ही दिल्ली पुलिस ने यह भी कहा कि हमें इनपुट मिली है कि कुछ अप्रिय घटना हो सकती आप पूरी मंजूरी लेकर ही रामलीला मैदान में रैली करें, हम पूरी जिम्मेदारी लेंगे| मगर आम आदमी पार्टी के कानों पर जूँ नहीं रेंगी|

आम आदमी पार्टी ने पहले तो जन्तर मंतर को २३ अप्रैल २०१५ को रैली वाले दिन ही अपनी रैली करने के लिए चुना, दिल्ली पुलिस से बात कर मंजूरी लेने के बजे इसकी सूचना इसी दिन मीडिया को दे दी गयी| साथ ही रैली की पूर्व संध्या यानि २२ अप्रैल २०१४ को आम आदमी पार्टी की सरकार ने दिल्ली सरकार के लैटर पैड पर एक पत्र लिख दिल्ली पुलिस को मीडिया से दूर रखने के लिए कहा| क्या यह कोई पूर्वनियोजित योजना का अंदेशा था?

नैतिक सवाल

यदि कोई किसी के समक्ष या पूरी भीड़ के सामने आत्महत्या कर रहा हो, तो क्या आप पहले उसका रजिनैतिक फायदा लेने की सोचेंगे, उससे सवाल जवाब करेंगे कि आत्म हत्या क्यूँ कर रहे हो या उसे आत्महत्या करने से रोकोगे? फैसला आपका?

मगर इस तथाकथित रैली में एक राजनैतिक पार्टी एवं उसके कार्यकर्ताओं ने एक किसान को आत्महत्या करने दिया या उसकी आत्महत्या को अपनी मूक सहमती दी| अब इस पर जनता क्या बोलती या सोचती है यह उसको सोचना है|

इस घटना के बाद लोगो अपने परिवारवालों,  रिश्तेदारों और मित्रों को ऐसी महा रैलियों में भेजने से रोकेंगे, क्या पता कि ऐसा दुबारा हो जाए?

क्या ऐसा पहले कभी हुआ है?

नहीं, ऐसा भारत की राजनीति में पहली बार हुआ है कि एक राजनैतिक पार्टी की रैली में ऐसी आत्महत्या किसी किसान या किसी अन्य व्यक्ति ने की हो| किसी अप्रिय घटना जैसे कि आतंकवादी हमले, दुश्मनों के हमले या भीड़भाड़ की वजह से भगदड़ होने पर रैली को तुरंत स्थगित किया जाता है|

ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी राजनैतिक पार्टी ने अपनी रैली में किसी को विशेष तौर पर बुलाया हो और उसकी लाश वापिस गयी हो|

एक याद

हमें याद है कि भाजपा की मेरठ में रैली हुयी थी जिसमें तब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और वर्तमान के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वहाँ मुख्य तौर पर आमंत्रित थे| उनके मंच से ५०० मीटर दूर एक बिजली के खम्भे पर तीन युवक चढ़े हुए थे| मोदी ने मंच से कहा कि आप तीनों नीचे उतर आयें नहीं तो यह रैली शुरू नहीं होगी और उन्हें चोधरी चरण सिंह की शपथ भी दी थी| उनके बोलते ही कुछ भाजपाई कार्यकर्त्ता और पुलिस सक्रीय हुयी और वो लोग नीचे उतर आये| अगर वो नीचे नहीं उतरते तो मोदी को पैदल चलकर खम्भे तक जाने में शर्म नहीं आती क्यूंकि यही आरएसएस के और भारतीयों के असली संस्कार हैं|

यदि दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल भी कुछ ऐसा ही करते तो शायद आज परिदृश्य अलग होता और उनका भी नाम रोशन होता| मगर, हा दैव| ऐसा कुछ नहीं हुआ|

राजनीति की अंध महत्वकांक्षा

उस किसान की आत्महत्या की कोशिश और मरने के बाद भी रैली में अरविन्द केजरीवाल का भाषण चलता रहा। सुसाइड नॉट बरामद होने पर कुमार विश्वास ने इसे मंच से पढ़कर सुनाया और पुलिस एवम् भाजपा को इसका दोषी ठहराया। गजेन्द्र किसान के मित्र का कहना है कि वो आत्महत्या कर ही नहीं सकता। आम आदमी पार्टी के बुलावे पर वो खुद पैसे लगाकर अपने साथ कई लोगों को ले गया था।


जब एक ऐसे किसान की आत्महत्या, जो किसी और राज्य का हो जहाँ विरोधी पार्टी का शासन है, एक राजनैतिक पार्टी की उस रैली में, जिससे उस पार्टी बहुत लाभ होना है, पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं और समर्थकों के सामने हो और जिसके मरने के बाद भी रैली में भाषण जारी रहे वो भी उसका सुसाइड नोट पढ़; तो उस किसान की

जो किसी और राज्य का हो जहाँ विरोधी पार्टी का शासन है, एक राजनैतिक पार्टी की उस रैली में, जिससे उस पार्टी बहुत लाभ होना है, पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं और समर्थकों के सामने हो और जिसके मरने के बाद भी रैली में भाषण जारी रहे वो भी उसका सुसाइड नोट पढ़; तो उस किसान की मौत का सबसे बड़ा फायदा रैली करने वाली पार्टी को ही होता है।

कायापलट

जो आम आदमी पार्टी अपने कार्यकर्ताओं पर इतना भरोसा करती है कि उन्हें वोटिंग बूथ की सुरक्षा के लिए पुलिस के समानांतर तैनात करती है ताकि वोटिंग बूथ की सुरक्षा की जा सके, मगर उसके कार्यकर्त्ता एक आदमी को पेड़ पर चढाने से रोकते नहीं है और उसे फांसी लगाने की कोशिश करने पर पेड़ से उतारते नहीं है|

जिस आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री पद का दावेदार बिजली के खम्भों पर चढ़ कर बिजली के कनेक्शन चालू या बंद कर सकता है ताकि मुख्यमंत्री बन सके, वो बहुमत पाकर मुख्यमंत्री बनने के बाद ४० मीटर दूर पेड़ पर चढ़े व्यक्ति को पेड़ से उतारने के लिए कुछ कदम पैदल भी नहीं चल सकता|



गजेन्द्र किसान की आत्महत्या से जुड़े कुछ सिलसिलेवार तथ्य

पहले तो आम आदमी पार्टी दिल्ली पुलिस को नहीं मानकर रामलीला मैदान की बजाय जंतर मंतर चुनते हैं।
दिल्ली पुलिस को लिखते हैं कि रैली स्थल से मीडिया को दूर रखा जाये।
आम आदमी पार्टी दो बार विधानसभा का चुनाव लड़ चुके गजेन्द्र सिंह को अपनी पार्टी में शामिल कर विशेष न्योते से दिल्ली बुलाती है।
गजेन्द्र अपने परिवार को कहता है कि आप कि हाई कमांड से यहां खेती की असली तस्वीर बताऊंगा।
गजेन्द्र उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया से मिलने उनके निवास स्थान जाता है, पर नहीं मिल पाता।
गजेन्द्र जंतर मंतर पहुँचता है वहां आप कार्यकर्ताओं से मुख्यमंत्री से मिलने के लिए कहता है।
आप के कार्यकर्त्ता ताली बजा बजा कर उसे उत्साहित कर मंच के सामने के पेड़ पर चढ़ाते हैं वो भी झाड़ू और चुनावी चिन्हों के साथ।
गजेन्द्र दो घंटे तक चिल्लाता रहता है कि केजरीवाल को बुलाओ नहीं तो निचे कूद जाऊंगा।
केजरीवाल जो बिजली के खंभे से चढ़ने से लेकर पद यात्रा तक करते हैं, मात्र 50 मीटर चल कर किसान की बात नहीं सुन सकते।
आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता तब तक आगे बढ़ आते हैं, पेड़ के पास विरोध कर रहे गेस्ट टीचर खड़े हो जाते हैं जो गजेन्द्र को निचे उतरने को कहते हैं।
गेस्ट टीचर सफल नहीं होते, कार्यकर्त्ता उन्हें पेड़ से हटा गजेन्द्र के लिए तालियां बजाते हैं।
दिल्ली पुलिस के कर्मचारी कार्यकर्ताओं को रोकते हैं कि तालियां मत बजाओ।
दिल्ली पुलिस फायर ब्रिगेड को फ़ोन कर सीढ़ी का इंतेज़ाम करने की कोशिश करती हैं।
दिल्ली पुलिस के कर्मचारियों को पेड़ तक कार्यकर्त्ता नहीं पहुँचने देते।
अब तक कुमार विश्वास मंच से गजेन्द्र को देख चुके होते हैं और माइक पर कहते हैं कि पुलिस उसे उतरे मगर कार्यकर्ताओंं को पेड़ के पास से हटने के लिए नहीं कहते।
जब गजेन्द्र लटक रहा होता है तब कुमार विश्वास अपना इस साल का प्रसिद्ध डायलॉग माइक पर बोलते हैं वो भी इशारे के साथ – “लटक गया” (जी न्यूज़ पर दिखाया गया विडियो)
जो सुसाइड नोट मिलता है उस पर किसी और की लिखावट होती है क्यूंकि गजेन्द्र की बेटी मना कर चुकी है कि ये लिखावट गजेन्द्र की नहीं है और उस पर पहले उपेन्द्र नाम लिखा है फिर काट कर गजेन्द्र नाम लिखा है।
गजेन्द्र का सुसाइड नोट सबके सामने माइक पर पढ़ कर सुनाया गया।
क्यों भाई सुसाइड नोट तो तुम्हे और तुम्हारे कार्यकर्ताओं को पुलिस से पहले दिख गया मगर आत्म हत्या करता किसान तुम्हें नहीं दिखा?

गजेन्द्र के फांसी पर लटकने की कोशिश और मरने के बाद भी केजरीवाल और उनकी प्रसिद्ध मंडली भाषण देना और रैली करना बंद नहीं करती।
केजरीवाल कहते हैं कि हस्पताल में जाकर देख लेंगे।
किसान की मृत्यु 2:55 सांय पर घोषित होती है मगर आपिये नेतागण अलका लाम्बा और अन्य 2:20 से ही किसान पर ट्वीट से संवेदना व्यक्त करना शुरू कर देते हैं।
गजेन्द्र की मौत के बाद किसी भी राजनेता को उनसे नहीं मिलने दिया जाता, अजय माकन को हस्पताल से आप कार्यकर्त्ता विरोध कर भगा देते हैं।
बतौर प्रत्यक्षदर्शी कोई आम आदमी पार्टी का नेता या कार्यकर्त्ता गजेन्द्र के बेटे को जो उनकी मौत के बाद भी रैली स्थल पे था, उसे सांत्वना देना तो दूर बात तक नहीं करते।
आम आदमी पार्टी एक राजस्थान के किसान को मरने के बाद 10 लाख तो दे रही है मगर जो किसान अभी भी राजस्थान में बिना सहायता के जीवन यापन कर रहे हैं और आत्म हत्या की कगार पर हैं, उन्हें अपनी रैलियोंं में बुला तो रही है मगर कोई एक रुपये की सहायता नहीं कर रही है।
जब मामला दिल्ली पुलिस में है और उसकी क्राइम ब्रांच इसकी जांच कर रही है तो खुद को दोषी ठहराए जाने से बचने के लिए बिना अधिकार से डिप्टी मजिस्ट्रेट से इसकी अलग जांच करने को कहती है।
आम आदमी पार्टी के नेता और कार्यकर्त्ता खुद गजेन्द्र की खुदखुशी के चीथड़े उड़ा संसद एवं विधानसभा से लेकर सड़क और फेसबुक तक उसका राजनैतिक फायदा लेने में लगे है, मगर दूसरी पार्टियों को ऐसा करने से रोक रहे हैं।
ताज़ा खबर – आवाज़ का राज

ताज़ा समाचार आने तक दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने चौकाने वाले खुलासे किये हैं| गजेन्द्र के मोबाईल के आखिरी लोकेशन कुरुक्षेत्र पाई गयी है जबकि उसका फ़ोन 10 दिन पहले बंद हो गया था| क्या गजेन्द्र के पास मरने के वक्त खुद का फ़ोन था? इसके अलावा दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी ने नवभारतटाइम्स को बताया कि खुदखुशी के इस केस में वो दो आवाजें महतवपूर्ण हैं जब कोई पहले कहता है कि लटक जा… और बाद में लटक गया…| दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने सभी चैनलों से उस दिन की रॉ फुटेज मांगी है|

मरने से पहले लखपति

इसके अलावा गजेन्द्र की बहन ने कहा है कि “जब गजेन्द्र से बात हुयी थी तब उसने कहा था कि उसके पास डेढ़ लाख रुपये हैं जो भतीजी की शादी में काम आयेंगे|” जो किसान kafi  समय से खेती ना कर रहा हो और उसका पैसे को लेकर झगडा हुआ हो, उसके पास मरने से ठीक पहले इतनी राशि होना किसी साजिश की तरफ ही इशारा करता है|

चलते चलते

अजय सीठा जी, जो गजेन्द्र के मित्र के मित्र हैं, फेसबुक पर लिखते हैं कि –

“गजेन्द्र के लिए आत्म हत्या करने की स्तिथि कभी आ ही नहीं सकती थी” – यह कहना है मेरे असीम मित्र कार्तिक बना का , मृतक गजेन्द्र उनके मित्रों में एक थे …… गजेन्द्र सिंग सोलंकी (कल्याणवत ) ग़रीब किसान नहीं बल्कि साफे के कारोबारी और गाँव के ज़मींदार परिवार से थे। स्वाभाव से उत्साही गजेन्द्र सिर्फ अपने साथ गाँव के कुछ किसानो को आम आदमी पार्टी के बुलावे पर अपने खर्च पर दिल्ली लाये थे.सु साइड नोट वाली बात मनघडंत है , उनकी आत्म हत्या करने का कोई कारण ही नहीं बनता बस एक चीज़ जो उनके व्यवहार में थी की वे किसी के लिए कुछ भी कर जाने के लिए तैयार रहते थे , उन्हें ऎसा करने के लिए उकसाया गया होगा , या वो बस डराने / ध्यान आकर्षण कराने के लिए ऎसा कर रहे होंगे / या पेड़ की डाली से उनका पाँव फ़िसला होगा । ज्ञात रहे कि गजेन्द्र सोलंकी सवाई मान सिंग परिवार से सम्बद्ध भवानी सिंग जी और सचिन पाइलट परिवार के करीबी थे !!”


नेताजी के खिलाफ कांग्रेस का दुष्प्रचार


नेताजी के खिलाफ झूठे प्रचार का जवाब

सबसे पहली बात तो यह है कि पत्रकार या तथाकथित लेखक मणिमुग्ध शर्मा जी ने उन्हीं हथकंडों और प्रचार सामग्री का उपयोग किया है जिसका प्रयोग ब्रिटिश हुकूमत नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और उनकी आज़ाद हिन्द फ़ौज़ को बदनाम करने के लिए करती थी।


मगर जब आज़ाद हिन्द फ़ौज़ के सैनिक ब्रितानिया सरकार के युद्धबंदी बनकर भारत पहुंचे और लाल किले की अदालत में उनपर मुकदमा चला तो सारी सच्चाई सामने आ गयी। खुद कभी नेताजी के विरोधी रहे वकील भूला भाई देसाई उनके बहुत बड़े प्रशंसक बन गए थे।

मणिमुग्ध एस शर्मा जी को आखिरकार नेताजी की याद तो आई! यह ब्लॉगपोस्ट उनकी ताज़ी खबर  http://navbharattimes.indiatimes.com/india/netaji-subhas-chandra-bose-wanted-ruthless-dictatorship-in-india-for-20-years/articleshow/46981633.cms का एक जवाब है।



 जब देश में सबको आज़ाद हिन्द फ़ौज़ का सत्य और उसकी कामयाबी मालूम पड़ी तो ब्रिटिश रॉयल आर्मी, रॉयल इंडियन नेवी और रॉयल एयरफोर्स में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत फ़ैल गयी जिसका नतीजा था 1946 की रॉयल इंडियन नेवी म्युटिनी जिसमें 13 जंगी जहाजों ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया था।
आज फिर वही ब्रिटिश प्रोपेगंडा का प्रयोग कर क्या मणिमुग्ध शर्मा अंग्रेज़ों के प्रति अपनी वफ़ादारी का प्रयोग कर रहे हैं?
आरोप – नेताजी ने 1935 में रोम की यात्रा की थी, ताकि अपनी किताब की कॉपी इटली के तानाशाह मुसोलिनी को भेंट कर सकें। नेताजी उसे बहुत पसंद करते थे और उसके ‘आदर्शों’ पर आजीवन चलना चाहते थे।
जवाब – नेताजी सुभाष चन्द्र बोस एक बहुत बड़े बुद्धिजीवी और देशभक्त थे। यूरोप में रहते हुए उन्होंने ना सिर्फ अपनी बीमारी का इलाज किया बल्कि प्रथम विश्व युद्ध के समापन पर हुई 1919 की ट्रीटी ऑफ़ वरसाइल के बाद के यूरोप के बारे में स्वयं जानना चाहते थे। उनकी बीमारी के दौरान ही इंग्लैंड के एक प्रकाशन संस्थान विशार्ट एंड कंपनी ने उन्हें भारत में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में अपने अनुभव संकलित कर एक पुस्तक लिखने के लिए।
 सुभाष चन्द्र बोस ने इसे स्वीकार किया और “इंडियन स्ट्रगल 1920-34″ लिखी। इस पुस्तक को टाइप करवाने के लिए उन्होंने एमिली शेंकल को टाइपिस्ट नियुक्त किया। बुक इंग्लैंड में छपी और तुरंत मशहूर हो गयी। इस पुस्तक में भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का पूर्ण ब्यौरा था। स्वयं तत्कालीन राजनैतिकविद रोमन रोल्लांड को यह पुस्तक बहुत पसंद आई थी और उन्होंने इसे एक ईमानदार लेखन बताया था। बताते चलें कि यह पुस्तक भारत में बैन हो गयी थी परन्तु यूरोप में मौजूद हर देश के राजनीतिज्ञों ने यह पुस्तक पढ़ी और बहुत पसंद करी थी।
यूरोप उस समय इलाज़ के लिए बहुत बड़ा केंद्र बना हुआ था। भारत में किसी भी बड़ी बीमारी के लिए पश्चिमी सभ्यता के डॉक्टर सीधे विएना, स्विट्जरलैंड और रोम के ब्लैक फारेस्ट जाने की सलाह देते थे। चिकित्स्कीय पर्यटन (मेडिकल टूरिज्म) भी रोम जाए बिना पूरा नहीं होता था। और जब एक भारतीय राजनीतिज्ञ रोम जायेगा तो मुसोलिनी की पार्टी का उससे मिलना स्वभाविक था क्यूंकि मुसोलिनी भारत के स्व्तंत्रता संग्राम का समर्थक था और
 ब्रिटिश हुकूमत का शत्रुप्राय। मोहम्मद इक़बाल शैदाई और सरदार अजित सिंह के साथ कई अन्य भारतीय क्रांतिकारियों को मुसोलिनी ने शरण दी थी। ठीक इसके विपरीत जर्मनी अपने ब्रिटिश-समर्थक विचारधारा के कारण कभी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का समर्थक नहीं रहा था। यह भी उल्लेखनीय है कि वीर सावरकर जैसे बहुत से भारतीय क्रन्तिकारी एवं नेतागण इटेलियन क्रांति से प्रभावित थे। अतएव जब सुभाष चन्द्र बोस 1934 में अपने इलाज़ के लिए ब्लैक फारेस्ट गए थे तब वहां उनका संपर्क इटालियन नेताओं से होना स्वभाविक था। बाद में उनके यही इटालियन संपर्क भारत से बनवास में निकालकर जर्मनी जाने के काम आए।
सुभाष चन्द्र बोस की 1934 में हिटलर से कोई मुलाकात नहीं हुयी। बोस इटली और जर्मनी के फासीवाद के ना तो समर्थक थे और ना ही प्रशंसक। अपितु उन्होंने रशिया के कम्युनिज्म और इटली एवं जर्मनी के फासीवाद को मिलाकर एक नयी विचारधारा के जन्म एवं समर्थन की बात कही थी।  नेताजी मुसोलिनी के मात्र प्रशंसक थे क्यूंकि वो यूरोप का एक प्रभावशाली शासक होने के बावजूद भारत के स्वतंत्रता संग्राम का सहयोग करता था। परन्तु कभी नेताजी ने उसके क़दमों पर चलने की बात नहीं कही थी। इसके अलावा नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और वीर दामोदर सावरकर दोनों ही गिउसेप्पे गैरीबाल्डी और मैज़िनी के प्रशंसक थे।

आरोप – उन्होंने अपने आप ही हेड ऑफ स्टेट यानी प्राइम मिनिस्टर, युद्ध मंत्री और विदेश मंत्री की उपाधियां दे दीं।
जवाब – जब खुद इंडिया इंडिपेंडेंस लीग के अध्यक्ष रास बिहारी बोस ने लीग और आज़ाद हिन्द फ़ौज़ का सम्पूर्ण नेतृत्व नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को दिया था, तब और कौन उन्हें क्या उपाधि देता? जापानी सरकार और  इंडिया इंडपेंडेन्स लीग के बीच में ही सारी कार्यवाही होती थी, परन्तु लीग को सरकार का दर्जा हासिल नहीं था। इसलिए नेताजी ने इंडिया  इंडिपेंडेंस लीग के अधीन ही आज़ाद हिन्द सरकार (प्रोविजनल गवर्नमेंट ऑफ़ फ्री इंडिया) का गठन किया था। जब पितृ संस्थान के अधिष्ठाता नेताजी थे तो पुत्र संस्थान के अधिष्ठाता वो क्यों नहीं होंगे? इसके अलावा खुद रास बिहारी बोस ने इस बात का अनुमोदन किया था कि नेताजी ही दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एकमात्र व् सर्वमान्य आधिकारिक नेता होंगे। स्वयं रास बिहारी बोस ने आज़ाद हिन्द सरकार के गठन की पूर्व संध्या पर सूचि देखकर अपना अनुमोदन दिया था कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ही नवीन सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, युद्धमंत्री एवं विदेश मंत्री होंगे। उस समय नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को छोड़कर और कोई बड़े दर्जे का राजनीतिज्ञ वहां नहीं था।

आरोप –  वह चाहते थे कि भारत आजाद हो, तो पहली वाली उपाधि उनके पास रहे।
जवाब – रास बिहारी बोस ने इंडिया इंडिपेंडेंस लीग का गठन किया था जो जापान सरकार पर निर्भर थी। प्रथम आज़ाद हिन्द फ़ौज़ के नाकामयाब होने के बाद रास बिहारी बोस ने जापान सरकार को नेताजी को जर्मनी से तुरंत लाने को कहा। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के आगमन पर तुरंत प्रभाव से रास बिहारी बोस ने इंडिया इंडिपेंडेंस लीग और आज़ाद हिन्द फ़ौज़ की जिम्मेवारी उन्हें सौंप दी थी। क्यूंकि लीग जापान सरकार पर निर्भर थी, इसलिए नेताजी ने बराबरी के लिए आज़ाद हिन्द सरकार का गठन किया था जिसमें आज़ाद हिन्द फ़ौज़ उनकी आर्मी थी जिसमें थल, जल और वायु तीनों टुकड़ियां उसके बाद लगाई गयी थी। आज़ाद हिन्द सरकार के पास एक बैंक भी था – आज़ाद हिन्द बैंक, जिसमें सभी भारतीयों से एकत्रित कर और दान रखा जाता था। सरकार के गठन के बाद जापान से सारी वित्तीय सहायता बैंक द्वारा कर्जे पर ली जाती थी। आज़ाद हिन्द सरकार के प्रतिनिधि के पास जापान सरकार से समझोते करने के लिए पद हो इसके लिए नेताजी को राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री की पदवी लेनी पड़ी।
ध्यान रहे इससे पहले राजा महेंद्र प्रताप ने काबुल में 1915 में फर्स्ट प्रोविज़नल गवर्नमेंट ऑफ़ फ्री इंडिया की स्थापना की थी। ऐसे प्रोविज़नल सरकारों की स्थापना किसी देश की आज़ादी से पहले क्रांतिकारियों द्वारा की जाती हैं ताकि उनका जीते हुए सीमा क्षेत्र में सरकारी व्यवस्था हो और विदेशों से आधिकारिक रूप से मदद ली जा सके। निकट इतिहास में शेख मुजिबर रहमान ने कलकत्ता में प्रोविज़नल गवर्नमेंट ऑफ़ बांग्लादेश बनाई थी, जिसने बांग्लादेश बनने के बाद में अपनी सरकार बांग्लादेश में स्थानांतरित कर ली थी। ध्यान रहे – भारत सरकार और प्रोविज़नल गवर्नमेंट ऑफ़ बांग्लादेश के समझोते के बाद ही भारत पाकिस्तान पर हमला कर बांग्लादेश को आज़ाद करवाने के लिए अधिकृत हुआ था। यदि मुज़बीर रहमान इस प्रोविज़नल सरकार का प्रधानमंत्री नहीं होता तो वो इंदिरा गांधी (तत्कालीन प्रधानमंत्री) से अपने देश को आज़ाद करवाने के लिए आधिकारिक समझौता नहीं कर सकता था।

समुन्द्र मंथन का इतिहास


समुन्द्र मंथन का इतिहास

वैज्ञानिक यह सिद्ध करते हैं कि सचमुच ये समुद्र मंथन हुआ था. अगर आपको इन बातो का यकीन ना हो तो इसे पूरा पढ़ें. समुद्रमंथन देवताओं और दानवों के बीच हुआ था जिसमें देवताओं और दानवों ने वासुकि नाग को मन्दराचल पर्वत पर लपेटकर समुद्र मंथन किया था.

गुजरात के दक्षिण मैं समुद्र में समुद्रमंथन वाला वही पर्वत मिला है. वैज्ञानिक ने परीक्षण के आधार पर इस बात की पुष्टि भी की जा चुकी है. पिंजरत नाम के गांव के समुद्र में मिला पर्वत बिहार के भागलपुर में विराजित मूल मांधार शिखर जैसा ही है. गुजरात-बिहार दोनों का पर्वत एक जैसा ही है. दोनों ही पर्वत में ग्रेनाइट– की मात्रा बहुत है. इस पर्वत के बीचों-बीच नाग देवता आकृति भी मिली है.

गुजरात मैं द्वारका के पास ही देवताओं और राक्षसों ने अमृत के लिए समुद्र मंथन किया था. मंथन के लिए मन्दराचल नाम के पर्वत का उपयोग किया था. समुद्र मंथन के दौरान विष भी निकला था, जिसे भगवान महादेव ने ग्रहण कर लिया था. सामान्यत: समुद्र में मिलने वाले पर्वत ऐसे नहीं होते. सूरत के आॉर्कियोलॉजिस्ट मितुल त्रिवेदी ने पर्वत का कार्बन टेस्ट के परीक्षण के बाद यह निष्कर्ष निकाला है. उन्होंने यह दावा किया है कि यह समुद्रमंथन वाला ही पर्वत है. और अब इसके समर्थन में अब कई प्रमाण भी मिलने लगे हैं. ओशनोलॉजी ने अपनी वेबसाइट पर इस तथ्य पर आधिकारिक रूप से पुष्टि भी की है.

सूरत से लगे पिंजरत गांव के समुद्र में 1988 में प्राचीन कृष्ण की द्वारकानगरी के अवशेष मिले थे. डॉ. एस.आर.राव इस साइट पर शोधकार्य कर रहे थे. और सूरत के मितुल त्रिवेदी उनके साथ थे. विशेष कैप्सूल में डॉ. राव के साथ मितुल त्रिवेदी समुद्र के अंदर 800 मीटर की गहराई तक गए थे. तब समुद्र के गर्भ में एक पर्वत मिला था. इस पर्वत पर घिसाव के निशान भी नजर आए. ओशनोलॉजी डिपार्टमेंट ने पर्वत के गहन अध्ययन शुरू किया. पहले ये माना गया कि घिसाव के निशान जलतरंगों के हो सकते हैं. विशेष कार्बन टेस्ट किए जाने के बाद पता चला कि यह पर्वत मांधार पर्वत है. पौराणिक काल में समुद्रमंथन के लिए इस्तेमाल हुआ पर्वत है. दो वर्ष पहले ये जानकारी सामने आई, परन्तु प्रमाण अब मिल रहे हैं.

ओशनोलॉजी डिपार्टमेंट ने वेबसाइट पर 50 मिनट का एक वीडियो जारी किया है. इसमें पिंजरत गांव के समुद्र से दक्षिण में 125 किलोमीटर दूर 800 की गहराई में समुद्रमंथन के पर्वत मिलने की बात भी कही है. इस वीडियो में द्वारकानगरी के अवशेष की भी जानकारी है. इसके अलावा वेबसाइट पर एशियन्ट द्वारका के आलेख में ओशनोलॉजी डिपार्टमेंट द्वारा भी इस तथ्य की पुष्टि की गई है.

मूल प्रति – डी रेड न्यूज़



संसद का इतिहास


संसद का इतिहास

राज दो ही कर सकते हैं – राजा या संसद| संसद का विरोध करने वालों, सबसे पुरानी संसद की स्थापना किसने करी थी और क्यूँ करी थी, पता भी है|पुरातन भारत में हर राजा के पास मंत्रिपरिषद होती थी, जिसका एक मुख्य मंत्री होता था| मंत्रिपरिषद के हर मंत्री के पास राज्य के सभी हिस्सों का कार्यभार होता था| उदहारणतया एक मंत्री के पास पाँच गाँव होते थे तो उन पाँच गांवों के सरपंच अपने में से एक मुख्य सरपंच बनाकर मंत्री के निर्देश में कार्य करते थे| मंत्री अपने ऊपर मुख्यमंत्री को सूचित करता था तथा मुख्यमंत्री राजा से बातचीत करता था| गांवों की संख्या अधिक होने से उपमंत्री भी बनाये जाते थे|

यह राज करने की पद्धति भारत में पुरातन काल से लेकर अभी तक चलती आ रही है| फर्क सिर्फ इतना है कि आज जनता विभिन्न पार्टियों को चुन सकती है, राजा के बजे पार्टी चुनती है कि मंत्रिपरिषद में कौन कौन होगा|
इस पद्धति का अपवाद तब उत्पन्न हुआ जब महाराजा ययाति को शुक्राचार्य ने श्राप दिया कि तुम अपनी जवानी खोकर बूढ़े हो जाओगे क्यूंकि ययाति ने पहले तो देवयानी फिर गुरुपुत्री शर्मिष्ठा से विवाह कर लिया था तथा फिर अन्य विवाह भी किये थे| क्षमायाचना करने पर शुक्राचार्य ने कहा कि तुम अपने किसी एक पुत्र कि जवानी ले सकते हो|
तब ययाति ने अपने पुत्रों – यदु, तुर्वसु, अनु, द्रुहू, और पुरु से बारी-बारी पूछा| पुरु सबसे छोटे थे उन्होंने बाकि बड़े भाइयों के मना करने पर अपना यौवन महाराजा ययाति को दे दिया| पुनः युवा होने पर ययाति ने पुरु को सम्राट बना दिया और अन्य पुत्रों को कभी भी राजा ना बनने का श्राप दे दिया| क्षमायाचना करने पर ययाति ने यदु, तुर्वसु, अनु, और द्रुहू को मंडलाधीशबना दिया एवं कहा कि जैसे जैसे तुम्हारी संतानें तुम्हारे अपने मूल वंश से निकलती जायेंगी राज्य करने योग्य बनती जाएँगी|
मंडलाधीश प्रधानमंत्री की तरह होते हैं जो विभिन्न मंडलों पर शासन करते हैं परन्तु मंडलों से सम्मिलित राज्य पर एक केंद्रीकृत राजा का राज्य होता है, जैसे यदु, तुर्वसु, अनु, और द्रुहू के मंडलों पर महाराजा पुरु का शासन होता था| जैसे जैसे यदु आदि भाइयों से उनकी संतानों के वंश अलग होते गए तो वह वंश राज्य करने लगे|
यदुओं यानी यादवों ने सबसे पहले लोकतंत्र की स्थापना की तथा एक राजा के ना होते हुए भी स्वतंत्र रूप से अपना राज्य चलाया| मथुरा, गुजरात तथा अन्य भागों में उनका शासन होता था| श्रीकृषण इसी यदुवंश में जन्मे थे| इन्होने लाभ की दृष्टि से सरस्वती नदी तथा समुन्द्र के संगम स्थान पर गुजरात में द्वारका की स्थापना की जिससे प्रमुख घाटों में मथुरा के साथ बंदरगाह पर यादवों का राज लोकतंत्र से चल रहा था|
नवीन काल में छत्रपति  शिवाजी ने  पुनः मंत्रिपरिषद को व्यापक अधिकार तथा महत्व प्रदान किये| उन्होंने स्वयं सेना अपनी मंत्रिपरिषद के अध्यक्ष – पेशवा को दे दी थी| राज्य की व्यवस्था पेशवा देखते थे परन्तु अंतिम निर्णय एवं फैसला छत्रपति शिवाजी का होता था|
अतःव संसद ख़त्म करोगे तो राज्य कौन करेगा – राजा| तो एक छत्रपति राजा के निचे सबको जीना पड़ेगा| राजा के समय आपके पास वोट करने का भी अधिकार नहीं होगा|

hindu dharm ko janiye


पहली बात तो यह है कि हिन्दू सनातन धर्म है और यह तब से जब से मानव है| इस धर्म में शाकाहारी भी हिन्दू है, मांसाहारी भी हिन्दू है, एवं सर्वाहरी भी हिन्दू है| जो भगवान् में विश्वास रखता है वो भी हिन्दू है, जो नहीं रखता वो भी| जो मंदिर जाकर पूजा करता है वो भी हिन्दू है, जो मंदिर नहीं भी जाता वो भी| जो व्यक्ति वेदों को मानता है वो भी हिन्दू है, जो वेदों को नहीं मानता वो भी| जो मूर्तिपूजा करता है वो भी हिन्दू है, जो निराकार को पूजता है हो भी| हिन्दू धर्म कई अन्य धर्मों (सिख, बौद्ध, जैन, आदि) का प्रारंभिक चरण गुरु है| इसके साथ ही यह सनातन हिन्दू धर्म कई अन्य सम्प्रदायों (निरंकारी, राधास्वामी, डेरा सच्चा सौदा, ब्रह्मकुमारी आदि) को भी अपनी अलग एवं स्वतंत्र सोच रखने का अधिकार देता है|


अन्य धर्मों के ठीक विपरीत इस धर्म को अपनाने के लिए तुरंत के पैदा हुए बच्चे को कोई दीक्षा या बप्तिस्मा नहीं लेना होता| ना ही हिन्दू कहलाने के लिए किसी संस्था की सदस्यता लेनी अनिवार्य नहीं है| हालाँकि दूसरे धर्म से हिन्दू धर्म में आने के लिए यज्ञ तथा कुछ प्रारंभिक संस्कार अवश्य करने पड़ते हैं परन्तु कोई सदस्यता नहीं चाहिए होती| हिन्दू धर्म में १६ संस्कार तो अवश्य होते हैं मगर जो उनका पालन नहीं करता वह हिन्दू धर्म से निष्काषित तो नहीं होता चाहे उसको उन संस्कारों से होने वाले लाभ तथा पुण्य प्राप्त ना हों|

हिन्दू धर्म किसी ऐतेहासिक घटना पर आधारित नहीं है अपितु उतना ही पुराना है जितना की मानव| आइये इस धर्म की शुरुआत कब हुयी उस पर दृष्टि डालते हैं|

30 कला = 1 मुहूर्त

30 मुहूर्त = 1 नक्षत्र अहोरात्रम (1 दिन)

30 नक्षत्र अहोरात्रम (30 दिन) = 1 मास

2 मास = 1 ऋतु

3 ऋतु = 1 अयाना

2 अयाना = 1 संवत (1 साल)

कलियुग = 432,000 साल

द्वापरयुग = 2 कलयुग = 864,000 साल

त्रेतायुग = 2 द्वापरयुग = 1,296,000 साल

सतयुग = 2 त्रेतायुग = 1,728,000 साल

1 महायुग = सतयुग त्रेतायुग द्वापरयुग कलियुग

1 मन्वन्तर = 71 महायुग

हर मन्वन्तर के बाद समस्त पृथ्वी एक समाधि कला (एक मन्वन्तर के ही बराबर समय) के लिए जल में डूब जायेगी।

1 कल्प = 1000 महायुग = ब्रह्मा का एक दिन

ब्रह्मा के 30 दिन = ब्रह्मा का 1 मास (1 माह)

ब्रह्मा के 12 माह = ब्रह्मा का 1 साल

ब्रह्मा के 50 साल = 1 परार्ध

2 परार्ध = ब्रह्मा के 100 साल = 1 पर = 1 महाकल्प = ब्रह्मा की पूरी आयु = 311.04 ट्रिलियन साल = 3,110,40,000,000,000 साल

अभी हमारे हिन्दू सनातन धर्म के रचियता (भगवान ब्रह्मा) की उम्र मात्र 50 साल हो चुकी है और अभी उनके 51वें वर्ष का पहला दिन अर्थात पहला कल्प, जिसका नाम शवेतवारह कल्प है, चल रहा है। उनके इस दिन में अभी तक छह मन्वन्तर पहले ही खतम हो चुके हैं। अभी सातवां मन्वन्तर वैवस्वतः मन्वन्तर यानी श्रद्धादेव मन्वन्तर चल रहा है। इस वैवस्त मन्वन्तर में, 27 महायुग (मतलब 27 बार चारों युग) पहले ही बीत चुके हैं तथा 28वें महायुग के सतयुग, त्रेता एवं द्वापर भी बीत चुके हैं। यह 28वां कलियुग है जोकि आपके ईसाई कैलेंडर के हिसाब से 3102 बिफोर क्राइस्ट आरम्भ हुआ है। क्यूंकि ब्रह्मा के पहले 50 साल यानी एक परार्ध बीत चूका है तो इसे द्वितीय (दूसरा) परार्ध भी कहते हैं।

इतने अधिक पुराने हिन्दू सनातन धर्म में बहुत से परिवर्तन हुए हैं जैसेकि महर्षियों तथा प्रकांड पंडितों द्वारा कई रचनाएं शामिल हैं| इनमें से कुछ अवव्यस्थित क्रम में निम्नलिखित है|

पहले वेद की ब्रह्मा द्वारा रचना – ऋग्वेद
मानव निर्माण के बाद महर्षि वेदक्व्यास द्वारा ऋग्वेद को तीन भागों में बांटा जाना – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद
सरलीकरण के लिए वेदक्व्यास द्वारा चतुर्थ वेद की रचना – अर्थवेद
अश्विनी कुमारों द्वारा आयुर्वेद की रचना
महर्षि वाल्मीकि द्वारा रामायण की रचना
वेदक्व्यास द्वारा ज्ञान संताप हरने के लिए श्रीमद्भागवत पुराण की रचना
अपने मन को शांत करने हेतु वेदक्व्यास तथा भगवान् गणेश द्वारा महाभारत (जय संहिता) की रचना
महर्षि पाणिनि द्वारा अष्टाध्यायी की
महर्षि पतंजलि द्वारा योग सूत्रों तथा सांख्य की रचना
इनके अलावा १८ पुराण, २४ उपपुराण तथा १०८ उपनिषद् हैं| यदि चार वेदों को विभिन्न प्रकारों में विभक्त किया जाए तो उनके यह प्रकार होंगे – संहिता (देवी-देवताओं की पूजन विधि),ब्राह्मण (वैदिक कर्मकांड एवं यज्ञ), आरण्यक (रूपक कथाएं एवं तत्त सम्बन्धी दर्शन), तथा उपनिषद् (वैदिक दर्शन)|



यह बात अलग है कि आजकल के विद्वान पुराणों, संख्याओं, प्राचीन साहित्य, उपपुराणों तथा उपनिषदों  की वैध्यता पर ही सवाल उठाते हैं मगर क्या ऊँगली उठाने से सत्य असत्य बन जाता है| ऊँगली उठाने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत भूमि जहाँ हिन्दू धर्म का जन्म हुआ ३००० से भी अधिक सालों तक मुगलों तथा अंग्रेजों का गुलाम रहा है| क्या इस गुलामी के दौर में इन साहित्यों की गलत प्रतियां बनाकर मूल ग्रंथों को छुपाया नहीं जा सकता है? उदहारणतया पद्म पुराण में बोद्धों और जैनों का उल्लेख है तथा भविष्य पुराण में मुगलों एवं मुग़ल शासन की महिमा उल्लेखित है| क्या एक धर्म के ग्रन्थ में उसी धर्म के विरोधियों तथा अन्य धर्मों का उल्लेख हो सकता है?

यदि अवतारों की बात करें तो हिन्दू धर्म मुख्यतया ब्रह्मा, विष्णु, एवं महेश तथा उनकी स्त्री शक्तियों क्रमशः सरस्वती, लक्ष्मी, तथा पार्वती(सती) पर आधारित है| त्रिदेवों के साथ त्रिदेवियाँ भी समय-समय पर धरा पर अवतरित हो धर्म का उत्थान करते हैं| आज के कलियुग में अभी हाल ही हुए प्रमुख अवतार यह थे – विष्णु अवतार – श्रीराम, विष्णु अवतार – श्रीकृष्ण, ब्रह्मा अवतार – तुलसीदास, शिव रूद्र – हनुमान, वरुण अवतार – झुलेलाल, राधा अवतार – चैतन्य महाप्रभु, आदि|

अब यह बताइए कि क्या उपरोक्त अवतारों में तथा ग्रंथों में कोई भी अंतिम था? नहीं| हिन्दू धर्म में कोई भी अवतार, ऐतेहासिक घटना, तथा ग्रन्थ स्थिर एवं अंतिम नहीं है| यह एक गतिमान तथा परिवर्तनशील धर्म है|

सन्दर्भ स्त्रोत-

विकिपीडिया

राजीव मल्होत्रा की पुस्तक – विभिन्नता (Being Different)

हिन्दू धर्म तथा अन्य अब्राह्मिक धर्मों में अंतर

Netaji shri shubhashchandra Boss


नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की कीमत बनाम भारत सरकार की क्षमता


उन दिनों की तरह नहीं जब मैं मोदी सरकार और भाजपा सरकार कहा करता था मगर आज मैं अपने देश के केंद्रीय शासन को सीधे तौर पर भारत सरकार कह कर संबोधित कर रहा हूँ| मोदी सरकार प्रथम श्रेणी के मजबूत जीवत के प्रधानमंत्री द्वारा सीमित शासक और अधिक शासन चलाई जा रही मजबूत सरकार का नाम नाम है| परन्तु “मोदी सरकार” शब्दों की सत्यता वहां आकर ख़त्म हो जाती है जब वो कुछ फाइलों को जनता के सामने खोलने से मना कर देती है| ऐसा करके वो एक पुरातन छाप वाली औपनिवेशिक भारत सकरार बन जाती है जिसे १९४७ में औपनिवेशिक स्थिति प्राप्त हुई थी और जो आज तक अंग्रेजों की ब्रितानिया सरकार के नक़्शे कदम पर चलती आ रही है|


चित्र  स्त्रोत – वर्ल्ड जनरल  नॉलेज

भारत जब अंग्रेजों का गुलाम था तब ना जाने कितने ही नामित-अनाम और प्रसिद्ध-अनजान व्यक्तियों ने अपने जीवन को खोने के साथ अपने परिवार के सदस्यों की जिंदगियां भी सिर्फ एक मकसद के लिए बर्बाद कर दीं थी और वो मकसद था भारत माता को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त करवाना| मगर जब सिर्फ उन्हीं के प्रयासों से देश स्वतन्त्र हुआ तो अंग्रेजियत के हिमायती इतिहासकारों ने अंग्रेजों से प्रभावित, एक पाक्षिक, और गलत इतिहास लिखते हुए उनका नाम लेना जरुरी ही नहीं समझा था| उन्हें सिर्फ उन व्यक्तियों के नाम याद थे जोकि एक अकेले परिवार से सम्बन्ध रखते थे जिस नेहरु वंश या गाँधी परिवार कहा जाता है| उन्होंने एक ऐसे वंश, जिसकी पुरातन उपस्थिति का कोई प्रमाण ही नहीं है, के क्रियाकलापों से मिलाने के लिए इतिहास को बदल-बदल कर संपादित कर लिखा| पश्चिमी तथा पश्चिम से प्रभावित देसी इतिहासकारों ने इन क्रांतिकारियों की प्रशंसा करने के बजाय उनको उग्रवादी और आतंकवादी घोषित करने में कोई कौर कसर नहीं छोड़ी|

यही घटनाक्रम उस व्यक्ति के साथ हुआ जिसे नेहरु वंश के भगवद पितामह श्री मोहन दास करमचंद गाँधी – महात्मा गाँधी – ने जिन्हें “देशभक्तों का देशभक्त, देशभक्तों का युवराज” संबोधन दिया था| वह व्यक्ति देशबंधु चितरंजन दास का शिष्य, स्वामी विवेकानंद का समर्थक, दक्षिणेश्वर काली का बहुत बड़ा भक्त, श्रीमदभगवद गीता में विश्वास रखने वाला, तथा क्रांतिकारियों गतिविविधियों का प्रबल समर्थक था|

हम उसके बारे में बात कर रहे हैं

जिसके बारे में लिखते हुए लेखक सोचता है कि “था” का प्रयोग करें या “है” का

जो क्रन्तिकारी गतिविधियों, भेष बदलने, गायब होने, तथा देशभक्ति में सबका गुरु था

जिसने अपने देश की आज़ादी के लिए संघर्ष ना करके उसको गुलाम बनाने वाले ब्रितानिया हुकूमत और अंग्रेजी ताज के खिलाफ युद्ध की उद्घोषणा करी थी

जिसने द्वितीय अंतरिम आज़ाद हिन्द सरकार, प्रथम आज़ाद हिन्द बैंक, तथा तृतीय आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना की

जिसकी आज़ाद हिन्द फौज बेशक से हार गयी मगर अपने मकसद में कामयाब हो गयी क्यूंकि इसके सैनिकों की कथाओं और प्रयासों से १९४६  में रॉयल इंडियन नेवी क्रांति हुई थी जिसने देश ही आज़ाद करवा दिया था

जिसके बारे में अंतिम ब्रिटिश राज्यपाल अर्ल माउन्टबेटन ने जवाहरलाल नेहरु को चेतावनी दी थी कि यदि नेहरु ने उस व्यक्ति का समर्थन किया और वह व्यक्ति वापिस आया तो पूरा देश उसे थाली में रखके देना होगा

जिसकी रशिया में जीवित होने की खबर ने हमारे देश के तीसरे प्रधानमंत्री और वर्तमान औपनिवेशिक भारत सरकार के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु को तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट अटली को शिकायती पात्र लिखा था

जिसकी स्थिति, पात्रता, और सक्षमता किसी भी बड़े सम्मान से अधिक है परमवीर चक्र और भारत रत्न से भी अधिक

जिसको यदि भारत रत्न या परमवीर चक्र दिया जाए तो सम्मानों का सम्मान और ही अधिक बढ़ जाएगा

जिसको जीवित या मृत्यु घोषित नहीं किया जा सकता

जिसको यह देश और इसके देशवासी श्रद्धांजलि देने हेतु सक्षम नहीं है


इन्होने अपनीआई०सी०एस० की राजशाही नौकरी, अपने व्यवसाय, तथा पूरी जिन्दगी अपनी मातृभूमि को  स्वतंत्र करवाने हेतु बलिदान कर दी थी| जब यह साबित हो गया कि कांग्रेस गाँधी जी की तानशाही के बिना नहीं चल सकती तो उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया वो भी तब जब उन्होंने गाँधी द्वारा उतारे गए उम्मीदवार पटाभी सीतारामय्या को चुनाव में हर दिया था| उस हार के बाद गाँधी ने कहा था कि यह मेरी हार थी नाकि सीतारामय्या की क्यूंकि उसको मैंने अपने कन्धों पर उठाकर यह चुनाव लडवाया था| बदला लेने के लिए, गाँधी के अनुयायियों ने प्रत्यक्ष रूप से सुभाष बाबू पर दबाव डलवाकर उनको अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया था| सुभाष चन्द्र बोस ने फारवर्ड ब्लॉक की स्थापना कर दी थी तथा जब कांग्रेस के वार्षिक समेल्लन स्थल के पास रामगढ में इसका वार्षिक सम्मलेन हुआ था तब फॉरवर्ड ब्लॉक के पंडाल में कांग्रेस से भी अधिक भीड़ थी| रामगढ के इस समेल्लन में यह निश्चित हुआ था कि विदशों से मदद के बिना भारत को आज़ाद नहीं करवाया जा सकता|

इसी निर्णय को मानते हुए नेताजी सुभाष चन्द्र बोस अपने कलकत्ता के निवास में नज़रबंदी से गायब हो जर्मनी पहुंचे थे| हिटलर के मना करने के बाद तथा उसके सुझावानुसार नेताजी पुनः गायब हुए तथा १०० दिनों की पनडुब्बी यात्रा के बाद जापान जा पहुंचे थे| सिंगापुर में रास बिहारी बोस ने आज़ाद भारत केंद्र (इंडिया इंडिपेंडेंस लीग) तथा आज़ाद हिन्द फौज की कमान नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को सौंप दी थी| नेताजी ने बिना कोई समय गंवाय द्वितीय आज़ाद हिन्द सरकार तथा प्रथम आज़ाद हिन्द बैंक की स्थापना करने के साथ ही आज़ाद हिन्द फौज का पुनर्गठन किया था|



चित्र स्त्रोत – इंडियानेटजोन

इसके साथ ही उन्होंने यूनाइटेड किंगडम और यूनाइटेड स्टेट्स के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी थी| आज़ाद हिन्द फौज ने नेताजी की कमान में ब्रिटिश भारत पर चढ़ाई कर इम्फाल और कोहिमा में तिरंगा लहरा दिया था| इसके साथ ही नेताजी ने जापान द्वारा जीते हुए अंडमान एवं निकोबार द्वीपों को भी जापान से लेकर उनका नाम शहीद और स्वराज द्वीप का नाम दिया था|

जब यह सब घटनाक्रम हो रहा था तब ब्रिटिश हुकूमत ने भारत को चारदीवारी में कैद कर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को जापान तथा जर्मनी की एक कठुपुतली घोषित कर दिया था| नेताजी तथा उनकी आज़ाद हिन्द फौज की एक भी खबर इस देश में नहीं आने दी जाती थी| अंग्रेज़ सरकार के साथ-साथ गाँधी, नेहरु, पटेल, तथा अन्य गाँधी के अनुयायियों ने नेताजी को अपमानित करने में कोई कौर-कसर नहीं छोड़ी थी| नेहरु ने तो उद्घोषित किया था, “ये सुभाष बाहर से सिपाहियों को लेकर भारत में आएगा, तो मैं अपने हाथ में तलवार लेकर उसका सामना करने वाला पहला व्यक्ति होऊंगा|” गाँधी जी ने भी खुलेआम भारत छोडो आन्दोलन के भाषण में कहा था की, “सभी व्यक्ति ब्रिटिश राज और ब्रिटिश व्यक्तियों में कोई अंतर नहीं कर पाते हैं| उनके लिए ये दोनों एक ही हैं| उनकी इस नफरत ने उन्हें जापानियों का स्वागत करने के लिए मजबूर कर दिया जोकि बहुत अधिक खतरनाक है| इसका मतलब यह है कि वो लोग एक दासता को दूसरी से बदल रहे हैं| हमें इस भावना से मुक्ति पानी होगी| हमारा झगड़ा ब्रिटिश लोगों के साथ नहीं है, हमारी जंग उनके शासन के खिलाफ हैं| ब्रिटिश शक्ति को हटाने का प्रस्ताव गुस्से से नहीं आना चाहिए|”

अब यह बताइए कि ब्रिटिश हम पर राज बिना अपने निवासियों के मदद से करते थे| क्या ब्रिटिश लोग हम हिन्दुस्तानियों से नफरत नहीं करते थे? क्या हमें अपने ही देश में दास और हेय की दृष्टि से नहीं देखा जाता था? यदि किसी ने आपको गुलाम बना रखा है तो क्या आपको गुलाम बनाने वाले के खिलाफ क्रोध नहीं आएगा? क्या आप अपनी मुक्ति के लिए गुलाम बनाने वाले के दुश्मन के साथ मिलकर अपनी मुक्ति का प्रयास नहीं करेंगे? या क्या दास धर्म में अथवा नमक के बंधन में फंसकर सदा के लिए गुलाम बने रहेंगे?

क्या आप लोगों को जरा सा भी अंदाजा है कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने जापान सरकार के समानांतर अपनी आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना करी थी जिसे १३ देशों से मान्यता प्राप्त थी तथा जिसके पास शहीद और स्वराज (अंडमान निकोबार) द्वीपों का शासनाधिकार था| इसके साथ ही नेताजी के पास एक बैंक था जिसमें वो अपने देश से बाहर रहने वाले भारतीयों से लिया हुआ दान जमा करते थे और जब वो गायब हुए थे तो उन्होंने अपने पीछे सोने से भरे हुए २३ बड़े ट्रंक छोड़कर गए थे| यदि जापान को भारत को गुलाम बनाना होता तो वो सुभाष चन्द्र बोस को कभी भी अलग स्वतन्त्र सरकार नहीं बनाने देता| क्यूँ लोग डॉक्टर बा मा शॉ का उदहारण भूल जाते हैं जिहोने जापान की मदद से बर्मा को आज़ाद करवाया था| उस साल १९४३ में, जापान ने बर्मा के साथ फिल्लीपिंस को भी आज़ादी दी थी वो भी बिना


किसी बंटवारे, बिना सत्ता हस्तांतरण (ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर) के, तथा बिना किसी नियम या शर्तों के| हाँ इन देशों के कुछ हिस्से जरुर जापानी सेना के पास थे ताकि वो अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ सकें मगर जापानी सेना ने युद्ध में हरने की बाद वापिस जाते हुए ये हिस्से खाली कर दिए थे| भारत फ़िलीपीन्स और बर्मा की अपेक्षा अधिक मजबूत स्थिति में था क्यूंकि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने आज़ाद हिन्द सरकार बनाकर जापान के प्रधानमंत्री के बराबर की स्थिति में थे| उनके बैंक ने जापान से अधिकारिक तौर पर कर्ज लिया था जिसे आज़ादी के बाद वापिस देना था| इसके ठीक विपरीत, बर्मा और फ़िलीपीन्स पूर्णतया जापान पर निर्भर थे क्यूंकि उनके पास ना तो कोई सेना थी, ना ही कोई सरकार, और ना ही कोई बैंक| ना सिर्फ आज़ाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर आक्रमण करने में बराबर की हिस्सेदारी की थी बल्कि आज़ाद हिन्द सरकार ने द्वितीय विश्व युद्ध में हार के बाद अलग से समर्पण किया था| यदि जापान के नीचे होते तो ऐसा कभी नहीं होता|

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने रेडियो पर विभिन्न सन्देश प्रसारित किये थे और अपना साहित्य गुप्त रूप से भारत में लगभग सभी जगहों पर भिजवा कर भारतीयों से याचना की थी कि उनकी आज़ाद हिन्द फौज को रसद और सहायता देकर दिल्ली तक पहुँचने में उनकी मदद करे| मगर इस देश को लोग इतने अहसानफरामोश और कृतघ्न थे और हैं कि उन्होंने नेताजी की सूचनाओं पर बिलकुल भी ध्यान नहीं दिया| आज़ाद हिन्द फौज सिर्फ इस लिए हार गयी थी क्यूंकि उसका भारत में से कोई भी रसद और सहायता प्राप्त नहीं हुई थी| जापान और मदद नहीं कर सकता था क्यूंकि अमेरिका ने उसकी जमीन पर हिरोशिमा और नागासाकी पर दो परमाणु बम्ब गिरा कर उसकी रीढ़ की हड्डी ही तोड़ दी थी| जापानी सैनिक आत्महत्या कर रहे थे, युद्ध से शर्मनाक वापसी कर रहे थे या वापसी के समय बिना सहायता के मर रहे थे| जापान अपनी निप्पोन सेना के सैनिकों की ही मदद नहीं कर पा रहा था| हजारों की संख्या में आज़ाद हिन्द फौज और जापान के सैनिकों की मृत्यु युद्ध तथा युद्ध से वापसी के दौरान हो गयी थी| ये सभी कहाँ गए थे? क्या वो कोई छुट्टी मनाने या दावत के लिए गए थे? नहीं वो सभी भारत को आज़ाद करवाने के मार्ग अग्रसर थे| और आजकल की जनता उन आज़ाद हिन्द और जापान के सेनानियों का कोई सम्मान ही नहीं करते हैं| आज़ाद हिन्द फौज के हजारों सैनिक मक्खियों के लार्वा यानि मगूतों के द्वारा जिन्दा खा लिए गए थे| क्या आपको पता भी है की मगूत क्या होते हैं? यदि पहले कभी इनके बारे में नहीं सुना तो यूट्यूब पर ढूंढकर विडियो देख सकते हैं|

यद्यपि आज़ाद हिन्द फौज हार गयी थी परन्तु जब इसके जवान भारत भूमि पर आये और उन्होंने देशवासियों को सत्य बताया था, तब भगवान् के लिए देश ने उनको सुना था| यही कारण था कि १९४६ में रॉयल इंडियन नेवी म्युटिनी हुयी थी जिसमें २०,००० नाविकों, २० बंदरगाहों, तथा ७८ जहाजों ने भाग लिया था|

१९४६ में तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री श्रीमान क्लेमेंट अटली ने ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स में इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट (भारतीय आज़ाद कानून) प्रस्तुत करते हुए अपने भाषण में ने इस क्रांति घटनाक्रम का जिक्र किया था| अटली ने कहा था कि, “मैं इस समस्या से २० साल से बिलकुल नजदीकी तौर से जुदा हुआ हूँ और मैं कहना चाहता हूँ कि यहाँ पर सभी और से गलतियाँ हैं, लेकिन इस समय हम भविष्य को देख रहें हैं नाकि भूतकाल को पीछे जाकर देख रहे हैं| मैं माननीय से सिर्फ यह कहना चाहता हूँ| सदस्यगण, भूतकाल के परिमय तत्कालीन परिस्थिति पर नहीं लगाए जा सकते हैं| १९५६ का तापमान १९२० का तापमान नहीं है और ना ही १९३० या १९४२ का तापमान भी है|”

तो ऐसा क्या हुआ था १९४६ में? और कुछ नहीं बल्कि आज़ाद हिन्द सैनिकों के द्वारा हुए खुलासे से यह यह रॉयल इंडियन नेवी क्रांति ही शुरू हुई थी| आज़ाद हिन्द फौज के लोगों ने ब्रिटिश सेना के उन व्यक्तियों के समक्ष यह प्रकट किया था कि देशप्रेम किसी भी नमक के बंधन से से अधिक शक्तिशाली होता है| सिग्नलमैन एम्०एस० खान और पेट्टी अधिकारी तेलेग्राफिस्ट मदन सिंह ने इस क्रांति का नेतृत्व किया तथा खुद की सेना को भारतीय नौसेना (इंडियन नेशनल नेवी) कहना शुरू कर दिया था| ब्रितानिया हुकूमत ने सरदार पटेल और मोहम्मद अली जिन्ना को क्रांतिकारियों से बात करने के लिए बुलाया था जिसके बाद क्रांतिकारियों ने क्रांति वापिस ले ली थी|



फिर भी उनका सन्देश एक दम पारदर्शी था कि ब्रितानिया हुकूमत अब अधिक समय तक ज्वालामुखी से निकलने वाले लावे और गैसों को नियंत्रित नहीं कर सकती थी|


स्वतंत्रता संघर्ष असल में वह जवाल्मुखी है जजों सिराजुद्दौलाह और टीपू सुल्तान के साथ युद्ध में पहली बार सक्रीय हुआ था परन्तु १८५७ की प्रथम क्रांति इसका पहली बार फटना था जिसे आसानी से नियंत्रित नहीं किया जा सकता था| पुलिस, लार्ड मैकाले का फर्जी शिक्षा तंत्र, क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (अपराधी नियामक कानून), तथा सिविल प्रोसीजर कोड (जनता नियामक कानून) पुरातन भारतीय समाज की रीढ़ की हड्डी तोड़ने में सफल हुए थे| रिसले का शारीर और रंग के हिसाब से हिन्दुस्तानियों का वर्गीकरण प्रयोग, आर्य-द्रविड़ियन के जैसे झूठे खुलासे, तथा अन्य फूट डालो राज करो के खेल भी कामयाब हुए| फिर भी स्वतंत्रता संग्राम रूपी जवालामुखी स्वाभिमान और आज़ादी की भूख से अधिकाधिक इंधन पा सक्रिय होते हुए फटता ही रहा| कांग्रेस, होम रूल लीग, रॉय बहादुर की उपाधि, नवयुवकों को मुफ्त में यूरोप पढने के लिए भेजना, हिन्दू धर्म के तमाम झूठों का प्रचार, राजा राम मोहन रॉय, तथा अन्य ब्रिटिश हुकूमत के हिमायती व्यक्ति और कुछ नहीं बल्कि जवालामुखी को नियंत्रित करने के लिए ब्रिटिशों के द्वारा लगाए हुए तथा नियंत्रित पाइप ही थे|

परन्तु फिर भी यह स्वतंत्रता जवालामुखी बिरसा मुंडा, गोपाल कृष्ण गोखले तथा गाँधी से पूर्व के क्रांतिकारियों के रुप में फटता ही रहा| महात्मा गाँधी यद्यपि अंग्रेजों द्वारा प्रस्तुत नहीं किये गए थे फिर भी वो इस स्वतंत्रता जवाल्मुखी को नियंत्रित करने वाले सबसे बड़े तथा कामयाब पाइप थे| फिर भी सवतंत्रता जवालामुखी आज़ाद हिन्द सैनिकों के आने से रॉयल इंडियन नेवी क्रांति के रूप में फट चूका था जिसने अंततः अंग्रेजों को अपनी भारत से निकासी का प्रबंध इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट (भारतीय आज़ादी कानून) १९४७ ब्रिटिश हाउस ऑफ़ कॉमन्स में पास करवाने तथा ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर (सता हस्तांतरण) की कार्यवाहियों को पूरा करने के रूप में किया था|

यदि भारतीयों और नेहरु, पटेल एवं गाँधी के साथ पूरी कांग्रेस ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के वचनों को मानकर उनकी आज़ाद हिन्द फौज को दिल्ली पहुँचाने में मदद की होती तो भारत का एक नया ही इतिहास होता| भारत को पूर्ण स्वराज्य तथा पूर्ण स्वतंत्रता की प्राप्ति होती नाकि औपनिवेशिक स्थिति की| तब आज के प्रधानमंत्री, मंत्रीगण, और राष्ट्रपति “पूर्ण स्वतंत्रता के कागजात” पर शपथ लेते हुए हस्ताक्षर करते नाकि “ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर” के कागज़ात पर मज़बूरीवश दस्तखत करते| यह ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर (सता हस्तांतरण) ना सिर्फ औपनिवेशिक स्थिति के साथ आई थी बल्कि हमारी मातृभूमि के दर्दनाक बंटवारे और सभ्जी ५६५ शाही राज्यों के पास इस अधिकार के साथ आई थी कि वो यह चुन सकें कि भारत में रहना है या पाकिस्तान में या एक अन्य राष्ट्र के रुप में रहना था|

वो नेताजी सुभाष चन्द्र बोस थे जिन्होंने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश किया था तथा यही क्लेमेंट अटली जोकि लेबर पार्टी के तत्कालीन प्रधानमंत्री थे और मुख्य व्यक्ति थे जब ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर (सता हस्तांतरण) भारत को सौंपा गया था|

१९७६ में ब्रिटेन के भूतपूर्व प्रधानमंत्री क्लेमेंट अटली अपने निजी दौरे पर हिंदुस्तान आये थे तथा राज भवन, कलकत्ता में मशहूर इतिहासकार रमेश चन्द्र मजुमदार की पुस्तक “हिस्ट्री ऑफ़ बंगाल” के विमोचन हेतु ३० मार्च १९७६ को उपस्थित थे| वहीँ पर पी०वि० चक्रबर्ती, १९५६ में पश्चिमी बंगाल के कार्यकारी राज्यपाल तथा कलकत्ता उच्च न्यायालय के भूतपूर्व मुख्य न्यायधीश थे, ने उनसे अंग्रेजों के भारत से जाने के बारे में पूछा था|

चक्रबर्ती ने पूछा, “अंग्रेजों ने भारत क्यूँ छोड़ा था? आखिर किस कारण ने अंग्रेजों को जल्दबाजी में भारत छोड़ने को मजबूर किया था जबकि गाँधी का भारत छोडो आन्दोलन १९४२ में बहुत पहले ही प्रक्रिया में मृत हो चूका था?

क्लेमेंट अटली ने तब भारत छोड़ने के कुछ कारण बताये और उसमें नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आज़ाद हिन्द फौज की गतिविधियाँ और आज़ाद हिन्द सैनिकों का वापिस आकर रॉयल इंडियन नेवी क्रांति को जन्म देना था जिसे ब्रितानिया हुकूमत पटेल और जिन्ना की मदद के बिना काबू करने में असफल रही थी|
अटली ने ने कहा था कि ब्रितानिया हुकूमत १८५७ की क्रांति के बाद तब तक भारतीय सेना पर निर्भर थी जब तक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व में बनी आज़ाद हिन्द फौज ने ब्रिटिश शासन के इन मजबूत खम्भों को तोड़ नहीं दिया था|

चक्रबर्ती ने पुनः पूछा था, “ब्रिटिश हुकूमत के भारत छोड़ने के निर्णय पर महात्मा गाँधी तथा उनके १९४२ भारत छोडो एवं उसके आन्दोलनों का कितना प्रभाव पड़ा था?”

क्लेमेंट अटली ने मुस्कराते हुए एक-एक अक्षर पर दबाव डालते हुए उत्तर दिया, “मि नी म ल (M I N I M A L)|”

अब मैं अपने सभी देशवासियों से उस व्यक्ति की कीमत पूछना चाहता हूँ जिसने अपना जीवन और सबकुछ देश को आज़ाद करवाने मे

तथा आपको एक औपनिवेशिक राज्य में स्वतन्त्र महसूस करने के लिए बलिदान कर दी थी| आप नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की कीमत लगा सकते हैं? क्या है उनकी कीमत? सिर्फ एक ट्वीट, एक ब्लॉग, एक छोटी सी खबर, या कृत्घन सरकार या प्रधानमंत्री के द्वारा एक फेसबुक पोस्ट या ट्वीट? क्या नरेन्द्र मोदी में इतनी क्षमता है की वो नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की टॉप सीक्रेट (प्रमुख गोपनीय) फाइलें खोलकर जनता के सामने रख सकें?
क्या भारत सरकार ताइवान, यूनाइटेड किंगडम, यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, इटली, जापान, इंडोनेशिया, सिंगापूर, वियतनाम, चाइना, रशिया, और अन्य देशों को उनके क्रमशः सीक्रेट आर्काइवों में पड़ी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की फाइलों को खोलने के लिए अधिकारिक कार्यालयी पात्र लिख सकती है? क्या भाजपा अपने शासन काल में बनाए गए जस्टिस मनोज मुख़र्जी आयोग की रिपोर्ट को सरकारी तौर पर स्वीकार कर सकती है
तथा नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का रहस्य पूर्णरूपेण सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायधीश की अध्यक्षता में सभी तरह से अधिकार प्राप्त एक एस०आई०टी० का गठन कर सकती है?



how to make a Bomb


बोली बम कैसे बनायें?

बम मनुष्य द्वारा बनाया गया एक ऐसा पिंड होता है जो विरोधी के ऊपर निशाना कर के फेंका जाता है और वह धमाके की आवाज के साथ जब फटता है तो विरोधी यातो मर जाता है या अधमरा और किम्कर्तव्य विमूढ़ हो जाता है. ऐसी स्थिति में वह बम फेकने वाले का कुछ बिगड़ तो नहीं पाता लेकिन उसे कोस सकता है और भद्दी गलियां दे सकता है ! बम का इतिहास जानने की आवश्यकता नहीं है लेकिन उसकी शक्ति बारे में जान लेना चाहिए. बम कई प्रकार के होते हैं जैसे हथगोला, सुतली बम, टाइम बम, रासायनिक बम, जैविक बम, परमाणु बम और बोली बम. यद्द्य्पी बोली बम के अलावा सभी बम बनाने के लिए बहुत अधिक तकनीक जानने की आवश्यकता होती है लेकिन बोली बम बहुत ही आसानी से बन जाता है! बोली बम का एक लाभ यह भी है की यह दूसरे बम की तरह किसी मेटल डिटेक्टर आदि से पकड़ा नहीं जा सकता और चलाने वाले के हाथ में नहीं फटता है. सामान्यतह जब कोई बम फेंका जाता है तो जिस पर बम गिरता है वह बच कर भागने की कोशिश करता है लेकिन बोली बम में खासियत यह है की यह जिस पर फेंका जाता है वह इसे पकड़ने की कोशिश करता है.
सामान्यतः इसका प्रयोग जनता में अपनी आवाज की गूँज सुनाने के लिए किया जाता है. इस बम का शिकार होने के बाद मनुष्य अपनी सोच समझ खो बैठता है और बम फेकने वाले को गन्दी गन्दी गलियां देता हुआ बम फेकने वाले को ढूँढने का प्रयास करता है लेकिन वह उसे देख कर भी कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता. बोली बम फेकने वाले को बम फेकने के बाद भागने की भी आवश्यकता नहीं होती बल्कि मीडिया उसे सुरक्षा पूर्वक अपने स्टूडियो लेजाकर उसका साक्षात्कार लेता है और उसकी बात जनता तक पहुंचता है.


बोली बम बनाने में प्रयोग सामग्री

बोली बम बनाने के लिए आपको जो रसायन और सामग्री चाहिए वह इस प्रकार है:
१. डाई हैड्रोजन मोनो अक्साइड
२. कल्शियम
३. एथिल अल्कोहल
४. फटे पुराने जूते चप्पल
५. उल्लू के ठप्पे



बम बनाने की विधि
यह बम बनाना बहुत ही आसान है. बम बना कर तुरंत ही चलाना होता है. अतः पहले अपना टार्गेट सेट कर ले कि किसे निशाना बनाना है. यदि कभी कभार आप जनता में हीरो बनना चाहते हैं तो यह बम आप खुद बना कर चला सकते हैं लेकिन अगर रोज या आये दिन आप इसे चला कर जनता में अपनी पहचान बना कर रखना चाहते हैं तो आपको कुछ उल्लू के ठप्पे ढूंढने होंगे.... जिस प्रकार एक बड़ी राजनितिक पार्टी ने ढून्ढ कर रक्खा है जो आये दिन टी वी पर दिखाई देता है...
डाई हैड्रोजन मोनो अक्साइड को सामान्य भाषा में पानी कहते हैं बम चलने से पहले इसे पी लेना चाहिए ताकि चलाने के बाद थकान न हो . इसके बाद कल्शियम जिसे आम भाषा में चूना कहते हैं इसका सेवन कर लेना चाहिये..




आम तौर पर यह पान मसाला या गुटखा में पाया जाता है. अब किसी ऐसे स्थान पर जाईये जहाँ मीडिया का कैमरा हो या इन्टरनेट के माध्यम से आपकी बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँच सके. अब भीड़ भाड़ वाले इलाके में किसी शरीफ आदमी को जिसका कोई अपराधिक रिकोर्ड नहो उसपर अपनी भाषा में गालियों के साथ बोली बम का प्रयोग कर दीजिये.. अगर संभव हो तो फटे पुराने जूते चप्पल के साथ बोली बम का प्रयोग कर सकते हैं.. ध्यान रहे की इस बम को चलते समय यदि मीडिया का कैमरा न हो तो उसका इन्तजार करना चाहिए वरना बम का असर कम होता है. बम चलने के बाद अगर आप पकडे भी जाते हैं तो पुलिस थाने लेजा कर छोड़ देगी और फिर आप अनेकों टी वी चैनेल्स पर इंटरव्यू देते हुए अपनी बात जनता तक पंहुचा सकते हैं..
अभी हाल ही में बोली बम का प्रयोग कुछ लोगों ने प्रशांत भूषन और अरविन्द कजरीवाल के ऊपर किया था जो बहुत ही सफल रहा.
आप सोच रहे होंगे की आपने जो एथिल अल्कोहल लिया था उसका प्रयोग तो हुआ ही नहीं.. तो भाई यह एथिल अल्कोहल सामान्य भाषा में शराब कहलाती है जिसे बम का प्रयोग करने के बाद आप सेवन कर सकते हैं.. इससे विरोधी की गालियों का प्रभाव ख़तम हो जाता है


आशा है आपको यह बोली बम का फ़ॉर्मूला पसंद आया होगा.. याद रखिये राखी सावंत और अपने डोग्विजय जी इसी बम के सहारे महान बने हुए हैं..तो मुझे धन्यवाद देकर शुरू हो जाईये..अगर आप बहुत बीजी हैं तो इसका प्रयोग करवाने के लिए एक दो उल्लू के ठप्पे ढूंढ लीजिये.. अगर यह शब्द समझ में नहीं आया तो अपने पडोसी से बोल कर देखिये.. ओये..उल्लू के ठप्पे इधर आ... बस वह बता देगा कि यह क्या होता है.... अब मैं आपके ऊपर बोली बम चला चूका हूँ..क्योंकि इतना समझाना भी बोली बम के बराबर होता है तो आप कोई प्रतिक्रिया दें उससे पहले मैं निकल लेता हूँ. जय लंकेश....