Saturday, 16 May 2015

थोरियम घोटाला और कोंग्रेस


थोरियम घोटाला : लो कुछ शून्य और लग गये...
क्या दुनिया की ऊर्जा संबंधी समस्याओं का सबसे बेहतर हलन्यूक्लियर एनर्जी में ही है ? इस सवाल के जवाब में मैं यहकहता हूं कि हां यह संभव है , बशर्ते ईंधन बदल लिया जाए।मेरे हिसाब से यह ईंधन थोरियम हो सकता है जिसे मैं सुपरफ्यूल कहता हूं। थोरियम कई जगहों पर भारी मात्रा मेंउपलब्ध है और इससे एटमी हथियार बनाना आसान नहीं है।लेकिन यह बिजली बनाने वाले एटमी रिएक्टरों में इस्तेमालहो रहे यूरेनियम की जगह अवश्य ले सकता है। और ऐसा होभी क्यों न , आखिर भारत और चीन जैसे मुल्क भी अबथोरियम आधारित रिएक्टरों की तरफ उम्मीद भरी निगाहों सेदेख रहे हैं। थोरियम संचालित रिएक्टरों की बात नई नहीं है। पर इनसे चलने वाले रिएक्टर बनाने में दुनिया नेदिलचस्पी नहीं ली। अब लोगों को , खास तौर से साइंटिस्टों को सोचना चाहिए कि इस वक्त दुनिया को एक ऐसीअफोर्डेबल और सेफ एनर्जी विकल्प की जरूरत है जो यूरेनियम जैसा विध्वंस न हो। इस मामले में थोरियम काकोई जोड़ नहीं है।

रिचर्ड मार्टिन , किताब - सुपर फ्यूल के लेखक
अब समझ आएगा की क्यों सायना मायनो ने राम सेतु तुडवाने के लिए सर पैर एक किये हुए थे,,
क्यों चीफ कंट्रोलर आफ माईन्स का पद को खाली रखा गया ...ये है ..
कांग्रेस का नया ''थोरियम घोटाला'', कीमत आप सोच भी नही सकते ४४ लाख करोड  ....४८ लाख करोड या ५०लाख करोड या और भी ज्यादा ...

भूल जाइये CWG  70 हज़ार करोड
भूल जाइये 2g  176 हज़ार  करोड भूल जाइये कोयला घोटाला 18 लाख  करोड
आ गये है ,,घोटालों के चाचा जान ये है थोरियम महान ... ४८ लाख करोड

भारत में दुनिया का लगभग ४४% थोरियम भंडार है ..

समुद्री किनारों से लगभग 44 लाख करोड़ का थोरियम गायब है जिसे काँग्रेसी सरकार ने चोरी करवा के अमेरिका को बेच दिया ये घोटाला राम सेतु से जुड़ा हुआ है जिसका खुलासा शहीद राजीव दीक्षित जी ने किया था अमेरिका और अमेरिकी ऐजेन्ट मनमोहन रामसेतु इसलिये तुड़वाना चाहते हैँ क्योँकि इसके नीचे और आस पास अरबोँ खरबोँ का थोरियम जमा है और ये घोटाला तो सिर्फ बानगी है भारत के पास आज भी अपार खनिज सम्पदा है लेकिन ये नेता लोग छोड़ेँ जब तो. भईया हम तो खूबई कमात है सोनिया डायन खाये जात है.

नियमों का उल्लंघन कर भारत के समुद्र तटो से 2.1 मिलियन टन समुद्री रेत गायब जिसमे था लगभग 195,300 टन थोरियम ...!

क्या है थोरियम घोटाला :
आरटीआई कार्यकर्ताओं औ देश के १३७ साल पुराने समाचारपत्र स्टेट्समैन ने ४८ लाख करो ड़ के थोरियम खनन घोटाले के बारे में बताया है। लेकिन देश को हुए पूरे नुकसान के बारे में‌ सटीक अनुमान तो कैग जैसी संस्था ही बता सकती है। हमारे देश में मोनाज़ाएट रेत से परमाणु ऊर्जा में आवश्यक तत्व थोरियम को निकालने का काम केवल सरकारी इंडियन रेअर अर्थ लिमिटेड (आईआरईएल) संस्था द्वारा उड़ीसा के छतरपुर, तमिलनाडुअ के मनावलाकुरिची, चवारा और अलुवा और आईआरईएल के औअने कोवलम (केरल) के अनुसण्धान केंद्र में ही किया जाता है। अगर कैग आईआरईएल, औअर देश के परमाणु ऊजा विभाग का औडिट करे तो देश को हुए पूरे नुकसान के बारे में‌ सटीक अनुमान लगाया जा सकता है। स्टेट्समैन अखबार के मुताबिक तो घोटाला ४८ लाख करोड का है जो अब तक के हुए सभी घोटालों की रकम से बीसीयों गुना ज्यादा है। घोटाले की जड़ में है सरकार का खनन मंत्रालय। देश में खनन का लाइसेंस नागपुर स्थित मुख्य खनन नियंत्रक द्वारा दिये जाते हैं । ३० जून २००८ तक इस पद पर एक ईमानदार अधिकारी श्री सी पी एम्ब्रोस थे । उनके रिटायर होने के बाद अब तक इस पद पर किसी की भी नियुक्ति अभी तक नहीं की गयी है। सेंट्रल ज़ोन के खनन नियंत्रक रंजन सहाय कार्यकारी तौर पर मुख्य खनन नियंत्रक का काम देख रहे है। सहाय के ऊपर नेताओं का वरद हस्त है। उसके खिलाफ़ कई शिकायते सीवीसी के पास पड़ी हैं। खन माफ़िया से मिल कर २००८ के बाद थोरियम जैसे राष्ट्रीय महत्व के खनिज का उत्पादन निजी क्षेत्र को सौंप दिया गया। इस रेत का निर्यात किया जाने लगा जिसे देश से बाहर भेजा जाना ही अपराध है। इस तरह चोरी किये गये खनिज का बाज़ार मूल्य ४८ लाख करोड बैठता है।


आपको ये जानकार आश्चर्य होगा की अपने देश के प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह अमेरिकन एजेंट है, उनके बयानों से तो ये ही लगता हें ।  मनमोहन ने करुणानिधि और T.R.Balu के साथ मिलकर ये प्लान बनाया है, भगवान श्री राम की सबसे बड़ी निशानी श्री राम सेतु को तोड़ा जाए और उसका मलबा और कचरा अमेरिका को बेचा जाये ....

आप लोगो की जानकारी के लिए बता दू, ये मलबा या कचरा नही है, भारतीय वैज्ञानिको का कहना है की इस सेतु ( धनुष-कोटि ) के तल मे 7 तरह के रेडियो एक्टिव ए

लीमेंट है | जो पूरी दुनिया में सिर्फ़ भारत में ही मिले है। जिसे निकाल कर 150 साल तक बिजली और परमाणु बम्ब बनाये जा सकते है




एटम बम' बनाना कितना आसान?

नागासकी में 1945 में हुआ एटम बम विस्फोट

ऐलेक्स किर्बी

ब्रिटेन के कुछ शोधकर्ताओं का निष्कर्ष दिल दहला देने वाला है. उनका कहना है कि आतंकवादियों के लिए एटम बम बनाना बेहद आसान है.

उनका कहना है कि एटम बम बनाने के लिए रसायन विज्ञान का पारखी होना आवश्यक नहीं है बल्कि ऐसा नकली दवाइयाँ बनाने से भी आसान है.


परमाणु ईंधन ले जा रहा जहाज़
उनका मानना है कि स्कॉटलैंड के ऊपर 1988 में पैन ऐम विमान में जिस बम से विस्फोट से किया गया था वैसा बम बनाना कोई कठिन काम नहीं है.

यह दावे ऑक्सफ़र्ड शोध संगठन (ओआरजी) के एक पर्चे में किए गए हैं. पर्चे का शीर्षक है- मॉक्स ईंधन से कामचलाऊ परमाणु विस्फोटक बनाना.

मॉक्स ईंधन यूरेनियम और प्लूटोनियम ऑक्साइड का मिश्रण होता है.

इसमें कहा गया है कि तकनीकी रूप से अक्षम आतंकवादी संगठन रेडियोधर्मी बम (इन्हें डर्टी बम का नाम दिया गया है) ही नहीं, बल्कि एक वास्तविक परमाणु विस्फोटक तैयार कर सकता है.

पर्चे में कहा गया है कि एक आतंकवादी संगठन को अगर "मॉक्स ईंधन मिल जाए तो उससे वह प्लूटोनियम आसानी से निकाल सकता है और इससे परमाणु विस्फोटक बना सकता है."

आसान निर्देश

पर्चे के अनुसार 1988 में लॉकरबी विस्फोट और 1995 में टोक्यो में सबवे में इस्तेमाल किए गए विस्फोटक "तैयार करने के लिए वैज्ञानिक कुशलता और योजना की आवश्यकता थी."

"यह दिल दहलाने वाली बात है कि मॉक्स से प्लूटोनियम निकालकर कामचलाऊ परमाणु विस्फोटक तैयार करने के लिए अत्यधिक कुशलता आवश्यक नहीं है."

"इस ईंधन से प्लूटोनियम निकालना मुश्किल काम नहीं है."

"स्नातक में दूसरे वर्ष का छात्र इस बारे में मौजूदा सामग्री का अध्ययन कर और इंटरनेट पर खोज कर यह तकनीक सीख सकता है."

ओआरजी का कहना है कि इस बारे में प्रयोग करने के लिए ज़रूरी प्लूटोनियम उत्तर-पश्चिमी इंग्लैंड के रेवनग्लास खाड़ी में मौजूद मिट्टी से भी निकाला जा सकता है.

वहाँ पर नज़दीक के सेलाफ़ील्ड मॉक्स ईंधन परिष्करण संयंत्र से निकलने वाला कचरा जमा होता है.

पर्चे के अनुसार बम बनाने वालों के लिए ऐसा करना आसान होगा और उन पर कोई शक भी नहीं करेगा.

वे ऐसा करने के लिए "पर्यावरण रसायनशास्त्र की आड़" ले सकते हैं.

छोटा लेकिन ख़तरनाक

पर्चे के अनुसार प्लूटोनियम ऑक्साइड बम प्रभावकारी होगा लेकिन धातुई प्लूटोनियम से बनने वाला बम भयानक विस्फोट करेगा.

ऐसा बम सिर्फ़ दो या तीन लोग मिल कर बना सकते हैं.


ऑक्सफ़र्ड शोध संगठन
प्लूटोनियम, बेरेलियम के खोल और प्लास्टिक के डिब्बे में बंद इस बम की परिधि क़रीब 80 सेंटीमीटर होगी.

ओआरजी का कहना है: "इस तरह के कामचलाऊ बम से होने वाले परमाणु विस्फोट की गंभीरता बारे में अंदाज़ा लगाना मुश्किल है."

"लेकिन अगर यह कुछ टन टीएनटी का एक छोटा हिस्सा भी हुआ तो इससे किसी भी बड़े शहर के बीचों-बीच का हिस्सा उड़ाया जा सकता है."

टीएनटी (ट्राई नाइट्रो टाल्यून) एक विस्फोटक है और इसकी मात्रा के विस्फोट से एटम बम की विस्फोटक क्षमता मापी जाती है.

विनाशकारी प्रभाव

"ऐसा कोई भी बम सौ टन टीएनटी के बराबर क्षमता से विस्फोट कर सकता है. शायद 1000 टन भी हो सकता है लेकिन इसकी संभावना नहीं है."

सौ टन टीएनटी की क्षमता का विस्फोट "विनाशकारी" होगा.


सेलाफ़ील्ड मॉक्स ईंधन संयंत्र
इस विस्फोट के 600 मीटर के दायरे में आने वाला कोई भी व्यक्ति विस्फोट, गर्मी या फिर रेडियोधर्मिता से मर सकता है.

"ऐसे विस्फोट में सैंकड़ों लोग मारे जा सकते हैं और हज़ारों घायल हो सकते हैं."

"आपातकालीन सेवाओं के लिए राहत का काम बेहद मुश्किल होगा."

रिपोर्ट में कहा गया है: "चाहे ऐसे बम से प्रभावकारी परमाणु विस्फोट न भी हो फिर भी इससे रासायनिक विस्फोट होगा और प्लूटोनियम सब दूर फैल जाएगा."

प्रभावित शहर का बड़ा हिस्सा लंबे समय तक रहने लायक नहीं रहेगा.

ओआरजी का निष्कर्ष है कि आतंकवादियों के लिए एटम बम के लिए ज़रूरी सामग्री चुराने की "दिल दहला देने वाली संभावना है."

संगठन ने ब्रिटेन की सरकार से अपील की है वह सेलाफ़ील्ड संयंत्र में परिष्करण के काम पर तुरंत रोक लगाए.

इस हफ़्ते सेलाफ़ील्ड में जापान से दो जहाज़ मॉक्स ईंधन लेकर पहुँच रहे हैं.

परमाणु बम्ब का इतिहास
१९०९ -- में रदरफोर्ड ने नाइट्रोजन के  ऑक्सीजन के रूप में तत्वान्तरित करने में सफलता पाई ।
१९३२--  में जेम्स चैन्डविक  के द्वारा  न्यूट्रान की खोज ।
१९३४-- इटली के वैज्ञानिक एनरीको फर्मी ने पहली बार परायूरेनियम को संश्लेषित किया ।(परायूरेनियम--परमाणु क्रमांक ९२ के बाद के तत्व)   १ ९३८-- जर्मनी की वैज्ञानिक आटोहान,फ्रिट्स स्टार्ट ,मिटंर ने युरेनियम विलयन पर हीलियम की बम्बारी कर बेरियम और क्रिप्टन पाया ।
 १९४२-- अमेरिका के शिकांगों विश्व विद्यालय में संसार की पहली परमाणु भट्टी की स्थापना की गयी । यह संसार की पहली नियंत्रित श्रंखला अभिक्रिया है ।
मैनहटन परियोजना -- यह परियोजना अमेरिका के परमाणु बम्ब पाने की परियोजना है । १६ जुलाई १९४५ को अमेरिका न्युमैक्सिको स्थित अल्मोड़ो रेगिस्तान में संसार का पहला परमाणु बम्ब का परिक्षण किया गया ।
६अगस्त १९४५ --को जापान  के हिरोशिमा नगर पर अमेरिका के द्वारा

लिटिल बॉय" नामक परमाणु बम्ब  गिराया गया । इसके तीन  दिन बाद

नागासाकी में पर फ़ैट मैन" नामक बम्ब गिराया गया पहला बम्ब

युरेनियम पर आधारित था ।  दूसरा प्लूटोनियम पर आधारित था । इन

दोनों  शहरों  में करीब दो से तीन लाख लोग मारे गए  थे ।

१९४९ -- में रूस  का परिक्षण

१९५२--  इग्लैंड के द्वारा अपना पहला परिक्षण आस्ट्रेलिया के रेगिस्तान

में किया गया ।
 १९५९ -- फ्रांस ने अल्जेरिया में किया गया ।

१९६४ -- चीन के द्वारा ।

१९७४--- भारतीय परमाणु बम्ब का परिक्षण
       स्थल --पोखरण ( राजस्थान )

  जनक -- रामा रमन्ना

परिक्षण का कूट नाम -- बुद्धा स्माइल

१९९८ -- भारत का दूसरा परिक्षण ।

१९९८-- पाकिस्तान के रासकोह पहाड़ी पर ।

२०० ६ --उत्तरी कोरिया के द्वारा

पूरा पढ़े और शहर करें ताकि हर हिंदुस्थानी जान सके ।

आधुनिक भारत में अंग्रेजों के समय से जो इतिहास पढाया जाता है वह चन्द्रगुप्त मौर्य के वंश से आरम्भ होता है। उस से पूर्व के इतिहास को ‘ प्रमाण-रहित’ कह कर नकार दिया जाता है। हमारे ‘देसी अंग्रेजों’ को यदि सर जान मार्शल प्रमाणित नहीं करते तो हमारे ’बुद्धिजीवियों’ को विशवास ही नहीं होना था कि हडप्पा और मोइन जोदडो स्थल ईसा से लग भग 5000 वर्ष पूर्व के समय के हैं और वहाँ पर ही विश्व की प्रथम सभ्यता ने जन्म लिया था।

विदेशी इतिहासकारों के उल्लेख

विश्व की प्राचीनतम् सिन्धु घाटी सभ्यता मोइन जोदडो के बारे में पाये गये उल्लेखों को सुलझाने के प्रयत्न अभी भी चल रहे हैं। जब पुरातत्व शास्त्रियों ने पिछली शताब्दी में मोइन जोदडो स्थल की खुदाई के अवशेषों का निरीक्षण किया था तो उन्हों ने देखा कि वहाँ की गलियों में नर-कंकाल पडे थे। कई अस्थि पिंजर चित अवस्था में लेटे थे और कई अस्थि पिंजरों ने एक दूसरे के हाथ इस तरह पकड रखे थे मानों किसी विपत्ति नें उन्हें अचानक उस अवस्था में पहुँचा दिया था।

उन नर कंकालों पर उसी प्रकार की रेडियो -ऐक्टीविटी के चिन्ह थे जैसे कि जापानी नगर हिरोशिमा और नागासाकी के कंकालों पर एटम बम विस्फोट के पश्चात देखे गये थे। मोइन जोदडो स्थल के अवशेषों पर नाईट्रिफिकेशन के जो चिन्ह पाये गये थे उस का कोई स्पष्ट कारण नहीं था क्यों कि ऐसी अवस्था केवल अणु बम के विस्फोट के पश्चात ही हो सकती है।

मोइनजोदडो की भूगोलिक स्थिति

मोइन जोदडो सिन्धु नदी के दो टापुओं पर स्थित है। उस के चारों ओर दो किलोमीटर के क्षेत्र में तीन प्रकार की तबाही देखी जा सकती है जो मध्य केन्द्र से आरम्भ हो कर बाहर की तरफ गोलाकार फैल गयी थी। पुरात्तव विशेषज्ञ्यों ने पाया कि मिट्टी चूने के बर्तनों के अवशेष किसी ऊष्णता के कारण पिघल कर ऐक दूसरे के साथ जुड गये थे। हजारों की संख्या में वहां पर पाये गये ढेरों को पुरात्तव विशेषज्ञ्यों ने काले पत्थरों ‘बलैक -स्टोन्स’ की संज्ञा दी। वैसी दशा किसी ज्वालामुखी से निकलने वाले लावे की राख के सूख जाने के कारण होती है। किन्तु मोइन जोदडो स्थल के आस पास कहीं भी कोई ज्वालामुखी की राख जमी हुयी नहीं पाई गयी।

निशकर्ष यही हो सकता है कि किसी कारण अचानक ऊष्णता 2000 डिग्री तक पहुँची जिस में चीनी मिट्टी के पके हुये बर्तन भी पिघल गये । अगर ज्वालामुखी नहीं था तो इस प्रकार की घटना अणु बम के विस्फोट पश्चात ही घटती है।

महाभारत के आलेख
इतिहास मौन है परन्तु महाभारत युद्ध में महा संहारक क्षमता वाले अस्त्र शस्त्रों और विमान रथों के साथ ऐक एटामिक प्रकार के युद्ध का उल्लेख भी मिलता है। महाभारत में उल्लेख है कि मय दानव के विमान रथ का परिवृत 12 क्यूबिट था और उस में चार पहिये लगे थे। देव दानवों के इस युद्ध का वर्णन स्वरूप इतना विशाल है जैसे कि हम आधुनिक अस्त्र शस्त्रों से लैस सैनाओं के मध्य परिकल्पना कर सकते हैं। इस युद्ध के वृतान्त से बहुत महत्व शाली जानकारी प्राप्त होती है। केवल संहारक शस्त्रों का ही प्रयोग नहीं अपितु इन्द्र के वज्र अपने चक्रदार रफलेक्टर के माध्यम से संहारक रूप में प्रगट होता है। उस अस्त्र को जब दाग़ा गया तो ऐक विशालकाय अग्नि पुंज की तरह उस ने अपने लक्ष्य को निगल लिया था। वह विनाश कितना भयावह था इसका अनुमान महाभारत के निम्न स्पष्ट वर्णन से लगाया जा सकता हैः-

“अत्यन्त शक्तिशाली विमान से ऐक शक्ति – युक्त अस्त्र प्रक्षेपित किया गया…धुएँ के साथ अत्यन्त चमकदार ज्वाला, जिस की चमक दस हजार सूर्यों के चमक के बराबर थी, का अत्यन्त भव्य स्तम्भ उठा…वह वज्र के समान अज्ञात अस्त्र साक्षात् मृत्यु का भीमकाय दूत था जिसने वृष्ण और अंधक के समस्त वंश को भस्म करके राख बना दिया…उनके शव इस प्रकार से जल गए थे कि पहचानने योग्य नहीं थे. उनके बाल और नाखून अलग होकर गिर गए थे…बिना किसी प्रत्यक्ष कारण के बर्तन टूट गए थे और पक्षी सफेद पड़ चुके थे…कुछ ही घण्टों में समस्त खाद्य पदार्थ संक्रमित होकर विषैले हो गए…उस अग्नि से बचने के लिए योद्धाओं ने स्वयं को अपने अस्त्र-शस्त्रों सहित जलधाराओं में डुबा लिया…”

उपरोक्त वर्णन दृश्य रूप में हिरोशिमा और नागासाकी के परमाणु विस्फोट के दृश्य जैसा दृष्टिगत होता है।

ऐक अन्य वृतान्त में श्री कृष्ण अपने प्रतिदून्दी शल्व का आकाश में पीछा करते हैं। उसी समय आकाश में शल्व का विमान ‘शुभः’ अदृष्य हो जाता है। उस को नष्ट करने के विचार से श्री कृष्ण नें ऐक ऐसा अस्त्र छोडा जो आवाज के माध्यम से शत्रु को खोज कर उसे लक्ष्य कर सकता था। आजकल ऐसे मिस्साईल्स को हीट-सीकिंग और साऊड-सीकरस कहते हैं और आधुनिक सैनाओं दूारा प्रयोग किये जाते हैं।

राजस्थान से भी…
प्राचीन भारत में परमाणु विस्फोट के अन्य और भी अनेक साक्ष्य मिलते हैं। राजस्थान में जोधपुर से पश्चिम दिशा में लगभग दस मील की दूरी पर तीन वर्गमील का एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ पर रेडियोएक्टिव राख की मोटी सतह पाई जाती है, वैज्ञानिकों ने उसके पास एक प्राचीन नगर को खोद निकाला है जिसके समस्त भवन और लगभग पाँच लाख निवासी आज से लगभग 8,000 से 12,000 साल पूर्व किसी विस्फोट के कारण नष्ट हो गए थे।

‘लक्ष्मण-रेखा’ प्रकार की अदृष्य ‘इलेक्ट्रानिक फैंस’ तो कोठियों में आज कल पालतु जानवरों को सीमित रखने के लिये प्रयोग की जातीं हैं, अपने आप खुलने और बन्द होजाने वाले दरवाजे किसी भी माल में जा कर देखे जा सकते हैं। यह सभी चीजे पहले आशचर्य जनक थीं परन्तु आज ऐक आम बात बन चुकी हैं। ‘मन की गति से चलने वाले’ रावण के पुष्पक-विमान का ‘प्रोटोटाईप’ भी उडान भरने के लिये चीन ने बना लिया है।

निस्संदेह रामायण तथा महाभारत के ग्रंथकार दो प्रथक-प्रथक ऋषि थे और आजकल की सैनाओं के साथ उन का कोई सम्बन्ध नहीं था। वह दोनो महाऋषि थे और किसी साईंटिफिक – फिक्शन के थ्रिल्लर – राईटर नहीं थे। उन के उल्लेखों में समानता इस बात की साक्षी है कि तथ्य क्या है और साहित्यक कल्पना क्या होती है। कल्पना को भी विकसित होने के लिये किसी ठोस धरातल की आवश्यक्ता होती है।
हमारे प्राचीन ग्रंथों में वर्णित ब्रह्मास्त्र, आग्नेयास्त्र जैसे अस्त्र अवश्य ही परमाणु शक्ति से सम्पन्न थे, किन्तु हम स्वयं ही अपने प्राचीन ग्रंथों में वर्णित विवरणों को मिथक मानते हैं और उनके आख्यान तथा उपाख्यानों को कपोल कल्पना, हमारा ऐसा मानना केवल हमें मिली दूषित शिक्षा का परिणाम है जो कि, अपने धर्मग्रंथों के प्रति आस्था रखने वाले पूर्वाग्रह से युक्त, पाश्चात्य विद्वानों की देन है, पता नहीं हम कभी इस दूषित शिक्षा से मुक्त होकर अपनी शिक्षानीति के अनुरूप शिक्षा प्राप्त कर भी पाएँगे या नहीं।

खुद को भारतीय कहने वालो गर्व करो ....

इतिहास में भले ही राइट बंधुओं का नाम दुनिया का पहला विमान उड़ाने वालों के रूप में दर्ज है, जिन्होंने 1904 में पहला विमान उड़ाया था। मगर भारत में तो 7000 साल पहले ही विमान उड़ा करते थे। ये विमान न सिर्फ एक देश से दूसरे देश तक जाने में सक्षम थे बल्कि एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक जाने की क्षमता भी इनमें थी। यह दावा कैप्टन आनंद जे बोडस ने भारतीय विज्ञान कांग्रेस में किया है।

विज्ञान कांग्रेस के दूसरे दिन रविवार को उन्होंने अपना विवादित लेक्चर दिया। कैप्टन बोडस एक पायलट ट्रेनिंग सेंटर से प्रिंसिपल के पद से रिटायर हुए हैं। इस दावे की वजह से कैप्टन बोडस को हाल ही में वैज्ञानिक समुदाय की ओर से आलोचना भी झेलनी पड़ी थी। विज्ञान कांग्रेस में ‘संस्कृत के माध्यम से प्राचीन विज्ञान’ विषय पर परिचर्चा के दौरान उन्होंने वैदिक ग्रंथों का हवाला देते हुए दावा किया कि प्राचीन भारत में विमानन तकनीक मौजूद थी।

उन्होंने कहा, ‘ऋगवेद में प्राचीन विमानन तकनीक का जिक्र किया गया है। महर्षि भारद्वाज ने सात हजार साल पहले ऐसे विमान की मौजूदगी की बात कही थी, जो एक देश से दूसरे देश जा सकता था। यही नहीं वह एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप, यहां तक कि एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक भी जाने में सक्षम था। उन्होंने विमान तकनीक के संबंध में 97 किताबें लिखीं थी। जबकि इतिहास में सिर्फ यही दर्ज किया गया कि राइट बंधुओं ने 1904 में पहली बार विमान उड़ाया।’ बोडस ने कहा कि महर्षि भारद्वाज ने ‘विमान संहिता’ नाम की एक पुस्तक लिखी थी, जिसमें विमान बनाने के लिए जरूरी धातुओं का जिक्र है। अब हमें विमान बनाने के लिए धातुओं का आयात करना पड़ता है। युवा पीढ़ी को उनके ग्रंथों को बढ़कर धातुओं का निर्माण यहीं पर करना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि प्राचीन भारत में विमान बहुत ही ‘बड़े’ हुआ करते थे। विमान का आधारभूत ढांचा 60 गुणा 60 फुट का होता था और कई मामलों में तो यह 200 फुट से भी ऊंचा हुआ करता था। वैदिक विमानों में छोटे-छोटे 40 इंजन हुआ करते थे। प्राचीन भारतीय रडार सिस्टम को ‘रूपांकररहस्य’ कहा जाता था।

पायलटों की डाइट और ड्रेस कोड का भी जिक्र
कैप्टन बोडस का दावा है कि महर्षि भारद्वाज की किताब में विमानों का ही जिक्र नहीं है बल्कि इसमें पायलटों की डाइट के बारे में भी जानकारी दी गई है। इसके अनुसार पायलटों को एक निश्चित समय तक भैंस, गाय और बकरी का दूध पीना चाहिए। यही नहीं उनके ड्रेस कोड के बारे में भी इस ग्रंथ में लिखा हुआ है।

नासा में जताया था विरोध
नासा रिसर्च सेंटर में वैज्ञानिकों ने ऑनलाइन याचिका दर्ज कर भारतीय विज्ञान कांग्रेस से इस लेक्चर को रद्द करने की भी मांग की थी क्योंकि इसमें विज्ञान को पौराणिक मिथक से जोड़ा गया है।


तर्कों पर आधारित है वैदिक भारतीय विज्ञान : जावड़ेकर
केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने प्राचीन भारतीय विज्ञान की वकालत करते हुए कहा कि वैदिक भारतीय वैज्ञानिक थ्योरी सदियों के अवलोकन, अनुभवों और तर्कों पर आधारित है।

यहां चल रही 102वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस के दूसरे दिन रविवार को ‘संस्कृत के माध्यम से भारतीय वैदिक विज्ञान’ विषय पर आयोजित चर्चा के दौरान जावड़ेकर ने कहा, ‘यह थ्योरी उपकरणों और मशीनों पर नहीं बल्कि सदियों के अवलोकन, अनुभवों और तर्कों पर आधारित है। इस ज्ञान को पहचानने की जरूरत है। यह ज्ञान आज भी प्रासंगिक है।’ उन्होंने कहा, ‘अगर जर्मन व अन्य हमारी भाषा (संस्कृत) और हमारे वैदिक विज्ञान के आधार पर नए उपकरणों का उत्पादन कर सकते हैं, तो हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते? चर्चा के लिए यह विषय काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि ज्ञान ही सर्वश्रेष्ठ है। इस परिचर्चा का उद्देश्य पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष और शैक्षिक है।’

केंद्रीय मंत्री ने कहा, ‘जो लोग ज्ञान के पथ पर चलना चाहते हैं, वे यह नहीं देखते कि यह कितना पुराना है। माना कि हर पुरानी चीज सोना नहीं होती, लेकिन हर पुरानी चीज कचरा भी नहीं होती। हमें यह स्पष्ट होना चाहिए कि विज्ञान का क्या मतलब है। मैं संस्कृत में भाषण नहीं दे सकता हूं कि लेकिन मैं अपने दिन की शुरुआत सुबह 6.55 बजे संस्कृत समाचार सुनकर ही करता हूं। अगर आप एक बार संस्कृत समझ जाएंगे, तो दूसरी भाषा भी आपको आसानी से आ जाएगी।’ उन्होंने कहा कि यहां मौजूद वैज्ञानिक समुदाय को संस्कृत भाषा के अपार कोष की ओर ध्यान देना चाहिए और इसका उपयोग मानव विकास के लिए करना चाहिए।

वैदिक विज्ञान पर हर्षवर्धन को मिला थरूर का समर्थन
वैदिक विज्ञान को लेकर छिड़ी बहस में केंद्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन को कांग्रेस सांसद शशि थरूर का समर्थन मिल गया है। हर्षवर्धन ने भारतीय विज्ञान कांग्रेस में कहा था कि बीजगणित और पाइथागोरस प्रमेय की शुरुआत भारत में हुई थी, लेकिन बाद में दूसरों ने इसका श्रेय ले लिया। इसके समर्थन में थरूर ने ट्वीट कर कहा कि हिंदुत्व बिग्रेड की वजह से प्राचीन भारतीय विज्ञान की वास्तविक उपलब्धियों को खारिज नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि वर्धन को पता होना चाहिए कि वह सही थे। मैंने 2003 में भी इस विषय पर लेख लिखा था। उन्होंने यह भी लिखा, ‘गणेश की प्लास्टिक सर्जरी की थ्योरी बेतुकी है, लेकिन सुश्रुत दुनिया के पहले सर्जन थे।



दुनिया का पहला विमान भारत में उड़ा था !
हम अपने सुनहरे अतीत पर नाज तो खूब करते हैं  पर शायद दिल से विश्वास नहीं करते।   हम बाबाओं के सपनों पर भरोसा कर खजानों की खोज में जमीन-आसमान तो एक कर सकते हैं पर अपने ग्रंथों की  विश्वसनीयता  पर शक करते रहते  हैं।

कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर शिवकर बापूजी तलपडे नामक एक भारतीय के अपने बुद्धि-कौशल से एक हवाई जहाज का निर्माण कर राईट बंधुओं से करीब आठ साल पहले 1895 में ही उसका सफल परिक्षण करने की खबर पर काफी बहस हुई थी। कुछ लोग इसे गौरव की बात कह रहे थे तो कुछ मखौल भी उड़ा रहे थे। पर इंटरनेट पर तलपडे के बारे में जो जानकारी उपलब्ध है उससे यह बात सच ही मालुम पड़ती है।  पता  नही क्यूँ हमें अपने ही लोगों पर भरोसा नहीं होता।  हमें अपनी ही विरासत पर संदेह रहता है। अपने सुनहरे अतीत पर बात तो खूब करते हैं  पर शायद दिल से विश्वास नहीं करते।
होना तो यह चाहिए था कि इस बात की तह तक जाया जाता।  ग्रंथों पर शोध किया जाता।  पर हमें अपनी लियाकत पर ही शक होने लगता है।  हम बाबाओं के सपनों पर विश्वास कर खजानों की खोज में जमीन-आसमान तो एक कर सकते हैं पर अपने ग्रंथों की विश्वसनियता पर शक करते हैं।  

शिवकर बापूजी तलपडे का जन्म 1864 में तबकी बंबई में हुआ था।  संस्कृत के विद्वान तलपडे को वैमानिक शास्त्र में गहरी दिलचस्पी थी जिसकी प्रेरणा उन्हें ऋगवेद के गहन अध्ययन से प्राप्त हुई थी।  उस समय लोगों की धारणा थी कि हवा से भारी किसी भी चीज को हवा में नहीं ठहराया जा सकता।  पर तलपडे का विचार कुछ अलग था।  जिसका संबल उन्हें ग्रंथों से मिल रहा था तथा उनके मार्ग-दर्शक थे पंडित सुब्बैया शास्त्री।  अपनी अथक मेहनत और लगन से उन्होंने एक मशीन की रुपरेखा बना उस पर काम करना शुरू किया।  उनकी मेहनत रंग लाई और दुनिया के पहले हवाई जहाज का निर्माण संभव हो पाया। तलपडे ने उसको नाम दिया "मारुतसखा".   इसकी सफल मानवरहित उड़ान का प्रदर्शन हजारों लोगों की भीड़ के सामने बंबई की चौपाटी में किया था।   इसका जिक्र "डेक्कन हेराल्ड" अखबार ने 2003 में कुछ इस तरह किया है, "भारत के मशहूर

राष्ट्रीयता वादी जज श्री गोविन-दा रानाडे और एच. एच. सियाजी राव गायकवाड़ ने मारुतसखा की मानव रहित संक्षिप्त उड़ान को देख कहा कि देश में विमानन विज्ञान का भविष्य उज्जवल है".   तलपडे के एक शिष्य पी. सातवेलकर के साथ-साथ और कई लोगों और पुस्तकों ने  भी इस ऐतिहासिक घटना की पुष्टि की है। इन के अनुसार यह मशीन जमीन पर गिरने के पहले  हवा में करीब 1500 फिट की ऊंचाई पर कई मिनटों तक रही।  इस अद्भुत परिक्षण के आठ साल बाद, 17 दिसंबर 1903 को राइट भाईयों की मशीन 120 फिट की ऊंचाई तक जा 37 सेकेण्ड तक ही हवा में रह पाई थी।  

पर तलपड़े की इस महान उपलब्धि उस समय की अंग्रेज सरकार को रास नहीं आई और उसने बड़ौदा के महाराज पर जोर डाला कि परिक्षण पर रोक लगाई जाए।  ब्रिटिश हकूमत के आगे झुकते हुए महाराज ने तलपडे को दी जाने वाली आर्थिक मदद बंद कर दी लिहाजा इस दिशा में और आगे कुछ नहीं हो पाया।  इस परिक्षण के बाद इस मशीन को तलपडे के घर में रख दिया गया। अपने ही देश में इतनी बड़ी उपलब्धि के बावजूद असम्मानित, हताश, निराश तलपडे की मृत्यु 1916 में हो गयी। वर्षों बाद उन्हें याद किया गया है।

अब तो उन पर आधारित एक फ़िल्म  "हवाईजादा" भी बन चुकी है,
काफी दिनों बाद मारुतसखा के एक मॉडल का प्रदर्शन मुंबई के  "विले-पार्ले" में हुई एक प्रदर्शनी में किया गया। इससे संबंधित कागजात "हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड" ने संभाल कर अपने पास रखे हुए हैं।  इस सवाल का कि हमारे ग्रंथों में इतनी बेशुमार जानकारी होने के बावजूद क्यों नहीं उसका उपयोग किया सका, एक ही उत्तर हो सकता है कि इस विद्या के दुरुपयोग होने के डर और आम इंसान की भलाई के लिए ही हमारे महान ऋषि-मुनियों ने इसको सार्वजनिक नहीं होने दिया होगा। जैसा कि परमाणु शक्ति के बारे में किया गया।  

Tuesday, 12 May 2015


बुद्धिजीवी एवं सेक्यूलर लोग दूरी बनायें रखें ,ये एक शापित अकाउंट है !!!

साले दिमाग चाट जाते है हराम की ओळलाद 😈😈😈😈😈😈😈😈😈😈😈😈😈😈